Talented View : यह बजट सिर्फ एक लालच है…

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कल से चारों तरफ बजट की चर्चा है। पान की दुकान से लेकर महंगे रेस्त्रां और चौराहों से लेकर दफ्तरों तक हर जगह बजट छाया हुआ है। नौकरीपेशा मध्यवर्ग में आयकर छूट की सीमा बढ़ाए जाने से जहां खुशी की लहर है वहीं छोटे किसानों को 6000 रुपया देने की भी चर्चा गरम है। मध्यवर्ग को पहली बार सरकार द्वारा सौगात दिए जाने से उमंग का वातावरण बन गया है और कई लोग इसे सरकार या मास्टरस्ट्रोक बता रहे हैं।  

Talented View : जनता का आशीष और प्यार ही असली भारतरत्न

मुझसे भी कई लोगों ने जानना चाहा कि बजट कैसा है? मैंने यही कहा कि चुनाव से पहले जैसा बजट होना चाहिए था, वैसा ही बजट है। चुनाव से ऐन पहले अंतरिम बजट यदि आएगा तो लोकलुभावन होगा ही। चुनाव से ठीक पहले का समय कड़वी दवाई खिलाने का तो होता नहीं है। यह समय हर वर्ग को खुश करने का होता है और यही कोशिश सरकार की तरफ से इस बजट में दिखी है। किसान, महिलाओं और मध्यवर्ग को लुभाने की भरपूर कोशिश हुई है। बजट के बाद भाजपा समर्थक खेमा सोशल मीडिया पर अतिउत्साही मोड में आ गया है जबकि विपक्ष बजट की खामियां गिनवा रहा है। किसानों के लिए 6 हजार की रकम को विपक्ष नाकाफी बता रहा है, लेकिन सवाल विपक्ष से है कि रकम भले ही कम हो, लेकिन शुरुआत तो सही हो गई है। 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन वाले किसानों की सुध अब से पहले किस सरकार ने ली थी?

Talented View : खुश होने की एक बड़ी वजह

विपक्ष यह भी बताए कि यदि वे सत्ता में आए तो क्या किसानों को 6 के बदले 60 हजार रुपए दे देंगे?  विपक्ष का काम ही है विरोध करना इसलिए कोई बात नहीं। भक्त सोशल मीडिया पर यह कहते दिखाई से रहे हैं कि बजट के दौरान विपक्षी नेताओं के चेहरे लटक गए, लेकिन भक्तों को कौन समझाए कि दो घंटे के उबाऊ भाषण के दौरान किसी का भी चेहरा लटक सकता है चाहे वह किसी भी पार्टी का नेता हो और राजनीति में दूसरे दल के नेता के वादों पर भला कौन नेता खुश हो सकता है? अंतरिम बजट एक तरह का चुनाव प्रचार है, वादा है, जो तभी पूरा हो सकेगा यदि हम सत्ता में दोबारा आए। यह बजट सिर्फ एक लालच है, जो दोबारा सत्ता में आने के लिए ही दिया गया है। 5 लाख की आय को टैक्स फ्री करना और किसानों को 6000 रुपया दरअसल राहुल गांधी की यूनिवर्सल बेसिक इनकम वाले वादे का तोड़ है। वादे सिर्फ विपक्ष में रहते नहीं किए जाते हैं बल्कि सत्ता में रहते हुए भी किए जा सकते हैं, यही इन बजट का कुल लेखा-जोखा है।

राजनीतिक दलों की यही मजबूरी है कि भारत की जनता अपने निजी फायदे को देखते हुए ही वोट देती है। देश के फायदे की किसी को नहीं पड़ी होती है। याद आता है एक किस्सा जब स्विटज़रलैंड में सरकार ने एक सर्वे करवाया था, जब देश के पास बहुत ज्यादा मात्रा में पैसा इकट्ठा हो गया था। सरकार ने जनता से पूछा कि क्यों न यह पैसा सभी नागरिकों को अतिरिक्त आय के रूप में बांट दिया जाए, लेकिन वहां की स्वाभिमानी जनता ने इसका भरपूर विरोध किया। उनका कहना था कि हम ईमानदारी और मेहनत से पैसा कमाना चाहते हैं, मुफ्त का पैसा हमें नहीं चाहिए । स्विटज़रलैंड की जनता का ऐसा स्वाभिमान हमें बहुत कुछ सीखा सकता है।  हमारे देश में तो मुफ्त बिजली, चावल और गेहूं के नाम पर चुनाव जीत लिए जाते हैं।

Talented View : इन्हें अपना सेनापति बदल ही देना चाहिए

स्वाभिमान की बात ही यहां बेमानी है। जनता का चरित्र ही ऐसा है तो नेता हमारे मंगल ग्रह से तो आएंगे नहीं। जैसी जनता-वैसे नेता। कल से हर नौकरीपेशा यह हिसाब लगा रहा है कि अब उन्हें टैक्स के रूप में कितने रुपयों की बचत होने वाली है? इस बचत को कहां खर्च करना है, इसकी भी प्लानिंग हो गई है। हमारी जेबों में कितना पैसा ज्यादा आ रहा है, इसकी हमें फिक्र है बाकी देश का क्या है? जो होना है, वह हो ही जाएगा। हमारा वोट तो उसे ही जाएगा, जो हमें सबसे ज्यादा चीजें मुफ्त देगा।

-सचिन पौराणिक

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