Talented View : इंसानों के सफर करने लायक हों भारतीय रेल

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अमूमन एक ट्वीट पर रेलयात्रियों की समस्या का समाधान करने वाले रेल मंत्रालय ने इस बार अजूबा ही कर डाला है। माता वैष्णोदेवी के दर्शनों को पहुंचे इंदौर के यात्री उस वक्त हैरान रह गए, जब ट्रेन के जिस डिब्बे में उनका रिज़र्वेशन था, वह डब्बा ही ट्रेन से गायब निकला। इंदौर के यात्रियों ने बताया कि माता के दर्शन के बाद उनका कटरा से वापसी का प्लान था, लेकिन कटरा में जब यात्रियों ने अपना डिब्बा बी-6 ढूंढा तो उन्हें वो डिब्बा मिला ही नहीं।

यात्रियों के हंगामा मचाने पर रेलवे अधिकारियों ने जम्मू में डिब्बा जुड़वाने का आश्वासन दिया, लेकिन जम्मू आने पर यात्रियों को जनरल बोगी में बैठ जाने के लिए कहा। इस पर यात्री भड़क गए और पटरियों पर बैठ गए।

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ट्रेन के बाकी मुसाफिरों ने भी इनका साथ दिया। पटरियों पर बैठने वालों में महिलाएं,बच्चे और बुज़ुर्ग भी शामिल थे। तीन महीने पहले से यात्रा की सुविधा के लिए टिकट बुक करवाने वाले यात्रियों के साथ भारतीय रेल का यह सलूक है।

एक घटना और है, जो इससे भी ज्यादा हृदयविदारक है। तमिलनाडु से उत्तर भारत घूमने आए यात्रियों में से 4 की ट्रेन में गर्मी की वजह से मौत (Four Passengers Die In Kerala Express) हो गई। केरल एक्सप्रेस की स्लीपर बोगी में ये यात्री सवार थे। आगरा-झांसी के बीच सिग्नल नहीं होने की वजह से ट्रेन को तपती गर्मी में खड़ा कर दिया गया। इससे कुछ यात्रियों की तबीयत बिगड़ने लगी। बीच रास्ते मे उन्हें प्राथमिक उपचार भी नहीं मिल पाया, जिससे उनकी मौत हो गई। यात्रियों की मौत की खबर से रेलवे हरकत में आया। शवों को झांसी में उतारकर उनके परिजन को सूचना दे दी गई।

इन दोनों घटनाओं से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारतीय रेलयात्रियों की सुविधा के लिए कितनी चिंतित है। स्लीपर श्रेणी में यात्री गर्मी से दम तोड़ रहे हैं तो जनरल डिब्बे में क्या होता होगा, यह सोचकर ही पसीने छूटने लगते हैं । मवेशियों की तरह सामान्य डिब्बों में भरी भीड़ में सांस लेना भी मुश्किल होता है। ऐसे में ट्रेन अगर कहीं रुक जाए तो यात्री त्राहि-त्राहि कर उठते हैं। भीड़ का आलम यह होता है कि यात्री न पानी भरने के लिए उठ सकता है न ही बाथरूम जाने के लिए। उन्हें पता होता है कि अगर एक बार अपनी जगह से उठे तो फिर हाथ-पैर फैलाने की जगह भी नहीं मिलने वाली।

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इन डिब्बों में कभी कोई टिकट चेक करने नहीं पहुंचता है । इन डिब्बों में सवार यात्री अपनी जान पर खेलकर सफर करते हैं, लेकिन इनकी फिक्र किसी को नहीं होती। रिज़र्वेशन के डिब्बों में तो फिर भी एक लिमिट के बाद टिकट देना बंद कर दिए जाते हैं, लेकिन सामान्य डिब्बों में टिकट बेचने की कोई तय सीमा ही नहीं है। सामान्य डिब्बों में अपनी क्षमता से 10 गुना ज्यादा तक यात्री लद जाते हैं। यात्री ऐसा शौक से नहीं करते, लेकिन उनकी भी मजबूरी है। या तो उन्हें बजट के हिसाब से इन डिब्बों में बैठना पड़ता है या फिर स्लीपर में टिकट न मिल पाने की वजह से, लेकिन भारतीय रेल की आखिर क्या जिम्मेदारी है? जब गर्मी के मौसम में यात्रियों का दबाव इतना अधिक होता है तो पर्याप्त नई ट्रेन क्यों नहीं चलाई जाती?

सामान्य और स्लीपर क्लास के अतिरिक्त डिब्बे क्यों नहीं इन ट्रेनों में जोड़े जाते? क्या ये यात्री मुफ्त में यात्रा कर रहे है? रेलवे को पैसा देने के बदले इन्हें क्या मिल रहा है? उत्तर भारत की यात्रा पर निकले यात्री गर्मी के कारण ट्रेन में ही दम तोड़ रहे हैं और हमारा सपना बुलेट ट्रेन चलाने का है? ऐसे में जब खबरें सामने आती हैं कि रेलवे यात्रियों को मसाज देने की तैयारी कर रहा है तो यात्रियों का खून खौल जाता है।

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आप मसाज बाद में देना, पहले बैठने की जगह तो दीजिये। भीड़ भरे कोचों में “फुल बॉडी मसाज” यात्रियों को मुफ्त में ही मिलती आ रही है। इस मसाज को झेलने वाले रेलवे की मसाज देने वाली खबरें सुनकर खून के आंसू रोते हैं। रेल मंत्रालय को सबसे पहले हमारी ट्रेनों को इंसानों के सफ़र करने लायक बनाने पर ध्यान देना चाहिए और उसके बाद मसाज़, बुलेट ट्रेन जैसे मज़ाक करने चाहिए।

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