Talented View : राजनीति के इस हमाम में सभी नंगे…

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भारतीय लोकतंत्र की संरचना कुछ ऐसी है कि इसमें कई बुनियादी खामियां है। यह सच है कि लोकतंत्र में सारी ताकत जनता को दे दी गई है, लेकिन ऐसा व्यवहारिक तौर पर है नहीं। लोकतंत्र का व्यावहारिक पहलू यह है कि लोकतंत्र असल में भीड़तंत्र बनकर रह गया है। एक पढ़े-लिखे, उच्च शिक्षित, बुद्धिजीवी के वोट का मूल्य वही है, जो एक अनपढ़ और गंवार के वोट का है। एक तरफ कोई समझदार वोटर सोच-समझकर सही प्रत्याशी को मत देता है तो दूसरी तरफ कोई देहाती एक देसी दारू की बोतल लेकर आपके वोट को न्यूट्रल कर देता है।

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एक मामूली चपरासी की पोस्ट के लिए आवेदन देते वक्त भी सरकार आपके आपराधिक रिकॉर्ड चेक करती है। आठवीं कक्षा उत्तीर्ण होना भी ज़रूरी होता है। यदि एक साइकिल चोरी का मामूली केस भी प्रत्याशी पर चल रहा है तो उसे चपरासी की नौकरी नहीं दी जा सकती है, लेकिन इस देश में चुनाव लड़ने के लिए कोई ऐसी पाबंदी नहीं है। निपट गंवार भी आसानी से चुनाव लड़ सकता है। चुनावी फॉर्म भरने में शैक्षणिक योग्यता आड़े आ ही नहीं सकती। आपराधिक पृष्ठभूमि के दागदार छवि वाले नेता भी नि:संकोच चुनाव लड़ सकते हैं।

उपरोक्त बातों का जिक्र आज इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि भोपाल से साध्वी प्रज्ञा को चुनाव लड़ने से रोकने की रोज़ ही कोई न कोई याचिका लगाई जा रही है। एक वर्ग में चर्चा चल रही है कि आतंक फैलाने के आरोप जिस पर लगे हैं, उसे टिकट क्यों दिया गया है?  क्या भाजपा के पास कोई स्वच्छ छवि वाला उम्मीद्वार नहीं था भोपाल से लड़ाने को?  रोज़ ही देश के किसी कोने से साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ आवाज़ उठ रही है। जब से प्रज्ञा को टिकट मिला है, वह अखबारों के पहले पेज पर छाई हुई है। कभी एनआईए तो कभी सुप्रीम कोर्ट तो कभी जनहित याचिका द्वारा साध्वी को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिशें की जा रही है, लेकिन असली सवाल यह है कि ऐसी कौन सी पार्टी है इस देश में, जिसने आपराधिक छवि वाले नेताओं को टिकट देने में परहेज़ किया है? कांग्रेस दशकों से सिख दंगों के आरोपियों को लोकसभा-विधानसभा पहुंचाती आई है।

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सपा, बसपा, राजद जैसी पार्टियों में राजा भैया, मुख्तार अंसारी, ब्रजेश सिंग, पप्पू यादव जैसे क्रिमिनल हमेशा से टिकट पाते आए हैं। लेफ्ट और टीएमसी ने मिलकर पूरे पश्चिम बंगाल पर ही गुंडा तत्वों को हावी कर रखा है। नई-नवेली, सत्ता को बदलने का दावा करने वाली ‘आप’ ने भी बाहुबलियों को टिकट देने में कभी संकोच नहीं किया। ऐसे माहौल में अगर साध्वी प्रज्ञा को टिकट मिल गया है तो इसमें हायतौबा क्यों मचाई जा रही है?  आपराधिक तत्व हमेशा से हर पार्टी के साथ चुनाव लड़ते और जीतते आए हैं। अब ऐसे हालात में कसूरवार किसे माना जाए? इन बाहुबलियों को, इन्हें टिकट देने वाली पार्टियों को या फिर इन्हें जिताने वाली जनता को?

जेल में बंद एक गुंडा जेल से ही चुनाव लड़ता है और जीत भी जाता है, लेकिन जेल में बंद एक आम कैदी को वोट डालने का अधिकार अभी इस देश में नहीं है, लेकिन चुनाव लड़कर जीतने वाला कैदी यदि मंत्री बन जाता है तो उसे हवालात में डालने वाले यही पुलिसवाले कल को इसे सैल्यूट करेंगे। यह भी हो सकता है कि इन्हीं पुलिस अधिकारियों की ड्यूटी इस गुंडे की सुरक्षा में लगा दी जाए। आज़म खान अगर किसी बड़े अधिकारी से बहनजी के जूते साफ करवाने की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है कि उन्हें इस सिस्टम की अच्छे से समझ है।

यहां यह बात बतानी जरूरी है कि आपका एजेंडा कोई और ही सेट कर रहा है। भाजपा ने साध्वी को टिकट दिया ही इसलिए था कि पूरे देश की चर्चा यहीं पर केंद्रित हो जाए, जो कि हो भी रहा है। साध्वी ने यह कहा, साध्वी ने वो कहा के बीच जनता के मुद्दे गायब हो गए हैं। भाजपा यही चाहती थी कि मुद्दों से ध्यान हट जाए और हिंदुत्व पर आ जाए। साध्वी की एंट्री ने यह काम बेहद आसान कर दिया। अब विपक्ष को चाहिए कि साध्वी को छोड़कर जनता से जुड़े मुद्दे उठाए क्योंकि जनता यह समझती है कि साध्वी अगर जमानत पर बाहर है तो राहुल-सोनिया भी जमानत पर ही हैं। आपराधिक केस लगभग हर नेता पर चल रहे हैं। किसी पर हत्या जैसे संगीन इल्ज़ाम हैं तो किसी पर भ्रष्टाचार के हल्के इल्ज़ाम। राजनीति के इस हमाम में दरअसल सभी नंगे हैं। जिस प्रकार एक फ़िल्म में डायलॉग था कि “यदि शिकायत के आधार पर ही वकीलों पर कार्रवाई करने लगे तो इस कोर्ट में सिर्फ वकील नहीं सिर्फ टाइपराइटर नज़र आएंगे।“ वैसे ही यदि हर आरोप पर नेताओं को दोषी मान लिया जाएगा तो संसद में भी नेता नहीं सिर्फ कुर्सियां ही नज़र आएंगी|

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