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Talented View : ‘अतिआत्मविश्वास’ से हमेशा बचकर रहना चाहिए

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न्यूज़ीलैंड से मिली मात के साथ ही भारत का विश्वकप जीतने का ख्वाब चकनाचूर हो गया। ‘टीम इंडिया’ का कल का प्रदर्शन देखकर क्रिकेटप्रेमियों को घोर निराशा हाथ लगी। किसी ने नहीं सोचा था कि न्यूजीलैंड जैसी टीम के सामने हम इस तरह घुटने टेक देंगे। खेल में हार-जीत लगी रहती है इसलिए ज्यादा फिक्र की बात नहीं है, लेकिन हार के कारणों पर चर्चा करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि कल के मैच में कई “सीखें” छुपी हुई है। पहली सीख यह है कि “अति आत्मविश्वास” से हमेशा बचकर रहना चाहिए।

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न्यूज़ीलैंड के प्रदर्शन और स्कोर को देखकर भारतीय टीम ऐसा सोचने लगी कि अब फाइनल का टिकट पक्का है। एक पक्ष ये भी था कि बारिश के कारण मैच स्थगित होता है, तब भी भारत को ही फाइनल खेलना था। इन सब समीकरणों के कारण भारतीय टीम अतिआत्मविश्वास का शिकार हो गई। विराट कोहली ने सोचा भी नहीं होगा कि उनकी कप्तानी में टीम इस अंदाज़ में हारेगी। उनके हावभाव यही दर्शा रहे थे मानो उनकी कप्तानी में टीम कप लेकर ही लौटेगी।

दूसरी सीख यह है कि हमें अपनी गलतियों को कभी नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिये, तब भी जब हम जीत रहे हों। अफगानिस्तान, इंग्लैंड और पाकिस्तान के खिलाफ मैच में हमारा मध्यक्रम लड़खड़ाता दिखाई दिया, लेकिन चूंकि हम वह मैच जीत गए इसलिए सब गलतियां माफ हो गईं। जीत के खुमार और अंकसूची में नंबर 1 पर होने के गुरुर में किसी ने यह सोचा ही नहीं कि जल्दी विकेट गिरने की सूरत में क्या रणनीति होना चाहिए ? मध्यक्रम में किस खिलाड़ी को कौन से नंबर पर खेलना चाहिए, इस पर ज्यादा मंथन किया ही नहीं गया।

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तीसरी सीख ये मिलती है कि बड़े सितारों को अपनी निजी उपलब्धियों के बजाय टीम के जीतने पर ज्यादा फोकस करना चाहिए। किसने सबसे ज्यादा शतक जमाए, किसने सबसे ज्यादा रन बनाए या फिर सबसे ज्यादा विकेट लेने जैसी बातों से बढ़कर उपलब्धि है कि विश्वकप किस टीम ने जीता ? हमारी टीम यदि हार रही है तो ये उपलब्धियां किस काम की क्योंकि बड़े-बड़े चेहरों से नहीं बल्कि जीत मिलती है छोटे-छोटे ईमानदार प्रयासों से।

चौथी सीख यह मिलती है कि आखिरी के ओवरों में तेज़ी से रन बनाने के लिए इंतज़ार करने के बजाय सिंगल हमेशा लेते रहना चाहिए। यदि 10-20 सिंगल भी बीच में आ जाते तो कल मैच का नतीजा कुछ और होता। तीन दिग्गज खिलाड़ी 1 रन पर आउट होने के बजाय 5-10 रन भी बना लेते तब भी भारत मैच जीत गया होता, लेकिन जिस तरह की गैर-जिम्मेदार बल्लेबाज़ी हमारे बल्लेबाज़ों ने की है, वह पराजय की एक बड़ी वजह है। सबसे आखिरी और ज़रूरी सीख यह मिलती है कि हमें तय करना ही होगा कि यदि कोई महान खिलाड़ी संन्यास लेने जा रहा है तो हमें उसकी गलतियों पर चर्चा करना है या नहीं? जी हां बात धोनी की ही हो रही है। कल बेशक उन्होंने अच्छी बल्लेबाज़ी की और टीम को जीत के करीब भी ले गए, लेकिन फिर भी जिस प्रदर्शन की उनसे उम्मीद थी, वह पूरे विश्वकप में कहीं नजर नहीं आया। अब धोनी को कुछ कहो तो उनके समर्थक नाराज़ हो जाते हैं, लेकिन क्या उनकी धीमी बल्लेबाज़ी और खेल के प्रति उनके रवैये की चर्चा भी नहीं कर सकते?

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निस्संदेह खेल में हार-जीत लगी रहती है, लेकिन कप की उम्मीद लगाए बैठे करोड़ों प्रशंसकों को कल भारत की हार बड़ा दर्द दे गई है। कागजों में दुनिया की सबसे बेहतरीन टीम असल में कागज़ के ही शेर बनकर रह जाएगी| इस बात की उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। अब इस हार का जिम्मेदार कोहली है, धोनी है, टीम प्रबंधन है या इंग्लैंड का मौसम इस पर सबकी अलग राय हो सकती है, लेकिन अगर अब भी हमने सबक नहीं सीखें तो आगे भी ऐसे नाज़ुक मौकों पर टीम को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा।

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