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Talented View : महकमों का निजीकरण कर जनता को राहत दें

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कुछ दिन पहले काम के सिलसिले में एक निजी बैंक जाना हुआ। काउंटर पर बैठी एक युवती ने मुस्कुराते हुए नमस्कार के साथ अभिवादन किया और पूछा कि वह हमारी क्या मदद कर सकती है ? हालांकि काम ज़रा सा था, लेकिन चूंकि वो चालू (करंट) खाता था इसलिए फॉर्म पर कंपनी की सील लगाना ज़रूरी थी, लेकिन बैंक वालों ने सहयोगी रवैया अपनाते हुए महज़ 2 मिनट में स्टेटमेंट दे दिया और कहा कि आपको जब भी समय हो, सील लेकर आ जाइएगा। हमने भी युवती को इस मदद के लिए धन्यवाद दिया और खुशी-ख़ुशी बैंक से बाहर चले आए।

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इस वाकये के कुछ समय बाद एक दिन मुझे एसबीआई जाने का काम पड़ा। काम वहां भी छोटा सा ही था, लेकिन वह किस काउंटर से होगा, यह जानने में ही मुझे 15 मिनट लग गए। झल्लाई सी शक्लें लिए बैठे हुए कर्मचारी, जिनकी तनख्वाह 1 लाख रुपया महीना है, काम के प्रति उनका रवैया उदासीन था। उनके चेहरे से ही प्रतीत हो रहा था कि इनकी काम करने के प्रति कोई रुचि नहीं है। जब उन “आंटीनुमा” मैडम को काम के बारे में बताया तो उन्होंने पहले मुझे घूरा और फिर पूछा कि खाते में नाम क्यों बदलवाना है? मैंने वजह बताई और सारे दस्तावेज भी प्रस्तुत किए, लेकिन उन्होंने काम को टालने के उद्देश्य से लंच बाद आने को कहा। लंच बाद दोबारा जाने पर बड़े अनमने ढंग से उन्होंने खाते में नाम बदला और मेरे करीब 2 घंटे बर्बाद कर दिए।

इस घटना के बाद से हर सरकारी महकमे और निजी क्षेत्र में काम करने वालों के रवैये को मैं गौर से देख रहा हूं और जो निष्कर्ष निकला है, वह यह है कि निजी क्षेत्र हर मामले में बेहतर है। जो काम महज 15 से 20 हजार रुपए कमाने वाली एक युवती निजी क्षेत्र में मुस्कुराते हुए कर रही है वही काम लाख रुपया महीना लेकर भी सरकारी कर्मचारी करने में कतराते हैं, इसकी वजह बिल्कुल स्पष्ट है। चूंकि निजी क्षेत्र वाले समझते हैं कि उनकी नौकरी, उनकी कार्यक्षमता, प्रतिभा और व्यवहार पर ही निर्भर करती है इसलिए वे इसे सहेजकर रखते हैं। वहीं सरकारी कर्मचारी अपने आप को सरकार का “दामाद” मान बैठते है।

उन्हें पता है कि चाहे वे काम करें या न करें, उनकी नौकरी सुरक्षित है। हर महीने पैसा उनके खाते में जमा होगा ही। वहीं निजी क्षेत्र वाले जानतें है कि उनकी नौकरी तभी तक है जब तक उनकी कार्यक्षमता बनी हुई है। निजी क्षेत्र इसलिए भी बेहतर सर्विस और सुविधाएं दे पाते हैं क्योंकि उनके पास काम के प्रति समर्पित स्टाफ होता है, लेकिन सरकारी महकमे ऐसे गधों से भरे पड़े हैं, जिनकी हैसियत निजी क्षेत्र में 15 हजार रुपया कमाने की भी नहीं है। ये लोग न खुद काम करते हैं न औरों को करने देते हैं और पूरे कार्यालयीन माहौल को बिगाड़कर रखते हैं। बैठकर कुर्सियां तोड़ने के ही जब सरकार इन्हें लाख रुपया महीना दे रही है तो भला ये काम आखिर क्यों करें?  मोदीजी भले ही 20 घंटे काम करें, लेकिन ये लोग तो 2 घंटे भी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं।

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यदि ये काम करते भी हैं तो इस लहज़े से मानो ग्राहक के ऊपर कोई अहसान किया जा रहा हो। नगर निगम, लोक निर्माण, पुलिस, बैंक, रेलवे, सिंचाई, विद्युत, श्रम, बीएसएनएल सभी सरकारी महकमे और इनके ज्यादातर कर्मचारी कामचोर हैं, निकम्मे हैं और मुफ्त की तनख्वाह ले रहे हैं।

ये चर्चा आज सरकारी महकमों की तरफ इसलिए मुड़ गई क्योंकि बीएसएनएल को लेकर असमंजस का माहौल बनता जा रहा है। इनके कर्मचारी, उपभोक्ता दुविधा में है कि बीएसएनएल बंद होगा या फिर इसका निजीकरण होगा। मुझसे पूछो तो मैं कहूंगा कि तत्काल प्रभाव से बीएसएनएल ही नहीं बल्कि हर सरकारी महकमे का निजीकरण हो जाना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों की कार्यप्रणाली ऐसी हो गई है कि इनका एकमात्र इलाज निजीकरण ही बचा है। बेहतर होगा कि सरकारें इस दिशा में सोचें और इन महकमों का निजीकरण करके जनता को राहत दें।

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