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Talented View : राजनीति क्या अंडरवर्ल्ड से भी बदतर ?

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मुंबई के गैंगवार बहुत प्रसिद्ध हैं। खैर, आजकल तो गैंगवार के किस्से ज्यादा सुनने को नहीं मिलते, लेकिन एक ज़माना था, जब मुंबई की गलियां रोज़ ही किसी न किसी गैंगवार की गवाह बनती थीं। शहर में बादशाहत कायम करने की जंग और डॉन नंबर-1 बनने के  ख्वाब के बीच प्रतिद्वंदियों का खून करने में कोई गैंग गुरेज़ नहीं करती थी। एक-दूसरे के खून की प्यासी यह गैंग बेहद शातिराना अंदाज़ में काम करती थी। निशाने पर आया बंदा कब-कहां होता है, किसके साथ होता है, किस समय उसके साथ कोई नहीं होता है, जैसी जानकारियां खंगाली जाती है।

इसके बाद बाकायदा प्लानिंग करके उसे गोली मारने की जगह और समय तय किया जाता है। गोली चलाने वाला भी शार्प शूटर होता है, जिसका चेहरा-मोहरा एक आम आदमी की तरह ही होता है। गोली शरीर मे कहां मारनी है और उसके बाद वह कैसे वहां से निकलेगा, ये सभी चीजें प्लान होती है, लेकिन इस गैंगवार के भी कुछ नियम होते थे।

ये डॉन-माफिया किस्म के लोगों के धंधे के भी कुछ उसूल होते हैं, जिनका पालन किया जाता है। ये माफिया, डॉन और उनके गुर्गे कभी किसी अन्य माफिया के परिवार पर हाथ नहीं डालते। इनका स्पष्ट मानना है कि उनकी दुश्मनी सिर्फ उस शख्स से है, उसके परिवार से नहीं। इसलिए ये गुर्गे कभी परिवार को इस गैंगवार के बीच नहीं लाते हैं। ये नियम अंडरवर्ल्ड की दुनिया में सख्ती से पालन किए जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि निशाने पर आए शख्स को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया जाता था क्योंकि वह उस वक्त अपने परिवार के साथ था। परिवार के सामने उस पर गोली चलाना इन गैंग्स को गवारा नहीं था।

अपवाद हर जगह हर धंधे में होते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर माफिया वर्ल्ड इन उसूलों को मानता है। उसूलों की बातें हो सकता है अंडरवर्ल्ड के बारे में आपने पहली बार सुनी हो, लेकिन सच्चाई यही है कि आजकल सिर्फ बेईमानी के धंधे ही ईमानदारी से होते हैं। माफिया वर्ल्ड जैसा समाज का तबका भी जिन नियमों को मानता है, उन सामान्य नियमों को भी राजनीति में तार-तार किया जा रहा है। राजनीति में रोज़ ही किसी नेता के परिवार पर न सिर्फ निजी हमले किए जाते हैं बल्कि शिष्टाचार के सामान्य तौर-तरीक़े भी भुला दिए जा रहे हैं।

कल आंध्रप्रदेश के गुंटूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को ‘लोकेश के पिता’ कहकर संबोधित किया तो इसके जवाब में नायडू ने मोदी की पत्नी यशोदाबेन का ज़िक्र कर दिया। बेटे, पत्नी, सास, दामाद, ससुर, पिता, मां के अलावा बाप-दादाओं तक को आजकल बयानों में घसीट लिया जाता है। राहुल गांधी भी भाषायी स्तर को गिराने में पीछे नहीं है। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री को लेकर जिस तरह की निम्न भाषा का उन्होंने उपयोग किया, वह भी शिष्टाचार के दायरे से बाहर है। वैसे राजनीति में आजकल ऐसा नेता ढूंढना मुश्किल हो चला है, जिसने भाषायी मर्यादा का पालन किया हो।

समय-समय पर हर नेता ने शब्दों की शालीनता का बलात्कार किया है और मर्यादा को तार-तार किया है। अंडरवर्ल्ड जैसे धंधों में भी जब परिवार को नहीं घसीटा जाता है तो राजनीति क्या अंडरवर्ल्ड से भी बदतर हो गई है? परिवारजन पर निजी हमले करके ये नेता देश की राजनीति को कहां ले जाना चाह रहे हैं? जब सामान्य हालातों में भी परिजन को नहीं बख्शा जा रहा है तो चुनावों में ये चीजें कैसे रोकी जा सकती है? अभी तो चुनाव की तपन शुरू ही हुई है और परिवार वाले राजनीतिक अखाड़े में घसीट लिए गए हैं। आगे जब यह तपन और बढ़ेगी, तब क्या होगा यह देखना शायद और भी दुखदायी होगा।

-सचिन पौराणिक

 

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