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Talented View : ग़लतफ़हमी और शक से होगा इंदौर का नुकसान

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टाटा की बहुप्रतीक्षित कार नैनो का किस्सा याद है? 2008 में पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा को नैनो कार के प्रोडक्शन के लिए जमीन आवंटित हुई। ज़मीन स्वाभाविक तौर पर किसानों से ही ली गयी थी। आमतौर पर जब भी ऐसा भूमि अधिग्रहण होता है तो किसानों को उचित मूल्य के अलावा वहां लगने वाले कारखाने में रोज़गार के अवसर भी मुहैया कराए जाते हैं। किसानों को जमीन का मूल्य भी मिल रहा था, साथ में अतिरिक्त आमदनी भी। लेकिन वहां के किसानों को भड़काया जाने लगा। किसानों ने  भी बिना सोचे-समझे टाटा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।   किसानों को लगा की टाटा उनकी जमीन भी ले लेगा, पैसा भी नहीं देगा और रोज़गार भी नहीं मिलने वाला। कारखाने से होने वाले प्रदूषण से उनका रहना भी मुश्किल अलग हो जायेगा। हो सकता है कुछ सरकारों और उद्योगपतियों ने किसानों की जमीन हड़पी भी हो, लेकिन किसान आंदोलन करते वक्त ये भूल गए कि सामने वाला आदमी रतन टाटा है। जिसकी ईमानदार छवि पर दुनिया भरोसा करती है। कुछ बेईमान उद्योगपतियों की कारगुजारियों की वजह से टाटा पर शक किया गया और किसानों ने उग्र आंदोलन किया। आखिरकार रतन टाटा को वहां से अपना कारखाना हटाने पर मजबूर होना पड़ा (Talented View On Indore Fake Advisory )।

तत्कालीन गुजरात की मोदी सरकार ने इस मौके को लपकते हुए टाटा को मनमानी जमीन, मनमाने दामों पर दे दी। मोदी उद्योगों के महत्व को समझते थे इसलिए उन्होंने आगे बढ़कर टाटा को गुजरात आने का न्यौता दिया। टाटा के गुजरात आने से वहां के हजारों युवाओं को रोज़गार मिला, लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर में वृद्धि हुई और कुलमिलाकर गुजरात को फायदा ही फायदा हुआ।

दूसरी तरफ सिंगुर के किसान टाटा को भगाकर आज भी वहीं के वहीं हैं।  कहने का मतलब यही है कि हर उद्योग, बिज़नस में अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोग होते हैं। एक समझदार उपभोक्ता को इनमें अंतर करना सीख लेना चाहिए।

ऐसा ही आजकल कुछ इंदौर में हो रहा है। एडवाइजरी के क्षेत्र में काम करने वाली कई बड़ी कंपनियां सिर्फ इसलिए शक की निगाह से देखी जाने लगी हैं क्योंकि ऐसी ही कुछ फर्जी कंपनियों ने निवेशकों को बेवकूफ बनाया है। अखबार इसे घोटाले की तरह पेश कर रहे हैं, लेकिन असलियत यही है की एडवाइजरी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों ने इंदौर के युवाओं को सबसे ज्यादा नौकरियां दे रखी हैं।  निवेशकों और जनता को समझ लेना चाहिए कि कुछ फर्जी कंपनियों की कारगुजारियों का ठिकड़ा बड़ी और ईमानदार कम्पनियों के सर पर नहीं फोड़ना चाहिए। ये चुनिंदा बड़ी कंपनियां अगर इंदौर से गई तो इसका नुकसान सबसे ज्यादा इंदौर के युवाओं और निवेशकों को ही होगा। 500-1000 युवाओं को रोज़गार देने वाली कंपनियां जहां जाएंगी, वहीं उनके लिए पलक-पावड़े बिछ जाएंगे, लेकिन इंदौर को जो नुकसान होगा उसकी पूर्ति आसान नही होगी।

सिंगुर प्रकरण से मीडिया, पुलिस और निवेशकों को सबक लेना चाहिये कि टाटा की तरह अगर ये कंपनियां भी इंदौर से गई तो इसका दीर्घकालिक नुकसान होगा। एडवाइजरी के क्षेत्र में काम कर रही बड़ी कंपनियों में अच्छे और बुरे के भेद को समझे बिना सभी कंपनियों पर उंगली उठाना बिल्कुल सही नहीं है। बेशक कुछ धूर्त लोगों ने इस बिज़नेस के नाम पर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की है लेकिन एडवाइजरी के क्षेत्र में निवेशकों को मोटा मुनाफा कमाकर देने वाली इन पुरानी कंपनियों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। अगर इन बड़ी एडवाइजरी कंपनियों कर अनुकूल माहौल इंदौर में नही बना रहता तो इंदौर के लिए ये बहुत बड़ा नुकसान होगा।

– सचिन पौराणिक

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