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Talented View : देश है तभी चुनाव है, नेता हैं और हम हैं

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कल आखिर वो दिन आने वाला है, जिसका पूरा देश और दुनिया इंतज़ार कर रही है। करीब 2 महीने चले लोकतंत्र के सबसे बड़े यज्ञ के समापन का इंतज़ार सभी टकटकी लगाकर कर रहे हैं। सत्ता पक्ष ने अपने सहयोगियों के साथ कल बैठक रखी, जिसमें सरकार बनने के बाद की रणनीति पर चर्चा की गई। इससे उलट विपक्षी दल के नेता इकट्ठे होकर चुनाव आयोग के पास शिकायत करने पहुंचे। विपक्ष हर ईवीएम की वीवीपेट पर्चियों से मिलान की मांग कर रहा था, जिसे आयोग ने खारिज कर दिया।

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आयोग का कहना है कि हांडी के चावल पके या नहीं, यह जानने के लिए सारे चावल निकालकर नहीं देखने पड़ते हैं, बस कुछ दानों को दबाकर देखने से यह पता चल जाता है कि चावल पका या नहीं?  वैसे ही हर जिले में कोई भी दो ईवीएम निकालकर उनको वीवीपेट से मिलाकर देख लो, पता चल जाएगा कि कोई गड़बड़ है या नहीं, लेकिन ईवीएम और चुनाव आयोग पर आरोप लगाने की ज़िद और दंभ में नेता यह सामान्य सी बात भी समझने को तैयार नहीं है। उनका कहना है कि सारी ही ईवीएम का मिलान वीवीपेट से होना चाहिए।

ऐसी मांग न ही तर्कसम्मत है न ही समझदारी से भरी। अगर हर ईवीएम का मिलान वीवीपेट से किया जाएगा तो यह काम करने में कम से कम 1 सप्ताह लग जाएगा। और यदि इसी गति से काम करने हैं तो चुनाव ईवीएम की जगह पर्ची से ही करवा लेने चाहिए थे और इसकी भी क्या ग्यारंटी है कि पर्ची से मतदान के बाद विपक्ष कोई नया आरोप नहीं लगाएगा?

आज वो ईवीएम बदलने का आरोप लगा रहे हैं तो कल पर्चियां बदलने का भी लगा सकते हैं। ये आरोप-प्रत्यारोप आखिर कहां जाकर रुकेंगे? विपक्ष को यह सोचना चाहिए कि उनके आरोपों का कोई ठोस आधार भी है या नहीं ?  खैर, इस बार लगता है विपक्ष ने मन बना लिया है कि वे ईवीएम, चुनाव आयोग, प्रधानमंत्री किसी पर भी आरोप लगाने में हिचकेंगे नहीं।

असल में विपक्ष की हालत उस विद्यार्थी जैसी हो गई है, जो जानता है कि परीक्षा में वह फेल होने वाला है इसलिए अपनी इज्ज़त बचाने के लिए वह पहले से ही बहाने ढूंढने लगता है। वह विद्यार्थी जानता है कि उसको या तो फेल होना है या सप्लीमेंट्री की परीक्षा देना है इसलिए दोनों ही परिस्थितियों में उसे किसी पर तो अपनी असफलता का ठीकरा फोड़ना ही है जबकि सत्ता पक्ष के छात्र ने परीक्षा में कठोर परिश्रम भी किया है और उसे यकीन भी है कि वह टॉप करने वाला है।  उस विद्यार्थी को नतीजों की ज़रा भी फिक्र नहीं है इसलिए वह आगे की तैयारी में लग चुका है।

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दो विद्यार्थियों की मनोस्थिति का यह बुनियादी फर्क है। जहां एक को पता है कि वह नाकाम होगा और दूसरे को पता है कि कामयाबी उसके ही पास आएगी इसलिए पहला वाला विद्यार्थी बहाने ढूंढने में लगा है जबकि दूसरा वाला आगे के कार्यों की रूपरेखा बनाने में व्यस्त है। ऐसे ही कल एनडीए की बैठक में सरकार बनने के बाद के कार्यों की रूपरेखा तय की गई जबकि विपक्ष के नेता मिलकर ईवीएम की सुरक्षा पर चिंता करते दिखाई दिए।

खैर, नतीजे चाहे जो आएं हमें अपने नागरिक कर्तव्यों का सजग होकर पालन करना है। कल के लिए विशेष तौर पर अफवाहों से बचना है और भावनाओं पर काबू रखना है। देश के कई इलाकों में शरारती तत्व दंगा और हिंसा भड़काने की कोशिश कर सकते हैं,  हमें उनसे सावधान रहना होगा। सोशल मीडिया पर कोई भड़काऊ पोस्ट दिखे तो उसे इग्नोर करें एवं बिना विचार उसे आगे प्रेषित करने की भूल न करें। चुनाव आते हैं, जाते हैं, लेकिन यह देश हमारा है, विरोधी पार्टी वाले भी हमारे ही भाई हैं।

विचारधारा की लड़ाई विचारों से ही लड़ी जानी चाहिए हथियारों और हिंसा से कदापि नहीं। कल के नतीजे चाहे कैसे भी रहें, यह देश और इसका लोकतंत्र महफूज़ रहना चाहिए। देश है तभी चुनाव है, नेता हैं और हम हैं ।

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