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 Talented View :  बिना जेब वाली पेंट मतलब भारत

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उच्च शिक्षित, सरकारी नौकरी वाले, सूट-टाई पहनने वाले लोगों की मार्केट की समझ सिर्फ शेयर बाजार के आंकड़ो तक ही सीमित होती है। शेयर मार्केट 40 हजारी हो चुका मतलब देश की अर्थव्यवस्था शानदार चल रही है। उन्हें इस बात का अंदाज़ भी नही होता है कि धरातल पर देश की जनता क्या कुछ झेलने को मज़बूर है? बाकी देशों की अर्थव्यवस्था हो सकता है शेयर बाजार के आंकड़ो से ही चलती हो लेकिन भारत की इकॉनॉमी में शेयर बाजार कोई बहुत बड़ा पहलू नही है।

ऐसा हो सकता है बल्कि कहना चाहिए कि हो रहा है कि शेयर बाजार आसमानी बुलंदियों को छू रहा है जबकि धरातल पर हालात बद से बदतर होते जा रहे है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। यहां की सवा अरब जनसँख्या दुनियाभर के उत्पादों के लिए सबसे बड़ा बाज़ार है। लेकिन ये उत्पाद तभी बिक सकतें है जब उपभोक्ता की ‘क्रय-क्षमता’ बढे। अगर आखिरी उपभोक्ता के पास पैसे नही बचेंगे तो वो कहाँ से कुछ खरीदेगा? और आंकड़े भी इस बात की पुरजोर तरीके से पुष्टि कर रहे है कि हमारे उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति कम होती जा रही है।

कुछ दिन पहले आपने खबर सुनी थी कि कारों की बिक्री ने रेकॉर्ड कमी आयी है। लेकिन इसके पीछे बीएस 6 को वजह बतलाकर ऑटो इंडस्ट्री के इस बड़े संकट पर हमने आंखे मुंद ली। अब खबरें आ रही है कि इंफोसिस, टाटा जैसी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों की छंटनी कर रही है। इसके अलावा देश मे पहली बार बम्पर मानसून के बावजूद बिजली की आपूर्ति में कमी देखने को मिल रही है।

अक्टूबर-नवम्बर के महीनों में अक्सर बिजली की अत्यधिक मांग रहती है। लेकिन इस बार बिजली की मांग में इतनी कमी आयी है कि देश के उत्तर-पश्चिमी भाग की 119 के करीब बिजली यूनिट ठप्प पड़ी है। औद्योगिक बिजली की मांग में आई भारी कमी के चलते थर्मल बिजली के ये प्लांट बंद करने पड़े है। इसके अलावा कोयले और न्यूक्लियर से बनने वाली बिजली के करीब 262 प्लांट भी बंद करने पड़े है। इनके पीछे एक ही वजह, मांग में अत्यधिक कमी है।

उद्योगों की दृष्टि से देखें तो अगर माल बिकेगा नही तो यूनिट बंद ही करना पड़ेगी। आखिर कब तक माल बनाकर गोदाम में रखा जा सकता है? ऑटो इंडस्ट्री के साथ यही हुआ और ऐसा अब हर इंडस्ट्री के साथ होने लगा है। ऐसा होने के पीछे भी एकमात्र वजह यही है कि उपभोक्ता की जेब मे पैसा नही होगा तो वो कैसे कुछ खरीदेगा? पेट भरने और तन ढंकने की व्यवस्था होने के बाद ही तो उपभोक्ता मार्केट की तरफ नज़र घुमाता है। लेकिन फिलहाल तो उसके खाने-कमाने के ही लाले पड़े हुए है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 2017-18 के बीच उपभोक्ता खर्च का सर्वे लीक हो गया है।इन आंकड़ो से साफ हुआ है कि 4 दशक में पहली बार उपभोक्ता की क्रय शक्ति में कमी आयी है। लेकिन सरकार ने एक विचित्र निर्णय लेते हुए कहा कि उस बार वो ये आंकड़े जारी ही नही करेगी। ये आंकड़े चीख-चीखकर बतला रहे है कि जीएसटी और नोटबन्दी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़कर रख दी। आंकड़े बता रहे है कि शहरी उपभोक्ता के खर्च करने की शक्ति में मासिक करीब 4% जबकि ग्रामीण उपभोक्ताओं में करीब 9% की बड़ी गिरावट आई है।

लेकिन चिंता की बात ये है कि धरातल पर हालात इनसे भी गए-गुज़रे बने हुए है। आखिरी उपभोक्ता की ऐसी हालत 4 दशक बाद बनी है। नौकरीपेशा वर्ग अपने प्रमोशन की जगह नौकरी बचाने को चिंतित है और व्यापारी, उद्योगपति न चाहते हुए भी कर्मचारियों की छंटनी पर मजबूर है। मूल बात सिर्फ इतनी है कि जब तक उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति नही बढ़ेगी तब तक हालात में सुधार नही आ सकता।

देश के आर्थिक हालात लगातार चिंताजनक बने हुए है लेकिन शेयर मार्केट चूंकि 40 हज़ार के पार निकल गया है इसलिए देश के संभ्रांत वर्ग को अर्थव्यवस्था में कोई गड़बड़ नज़र नही आ रही है। इस वर्ग को ये समस्या तब तक नज़र नही आएगी जब तक बात उनकी खुद की जेब तक नही पहुंचे। और जब बात उनकी जेब तक पहुंचेगी तब तक शायद ज्यादातर जनता की जेबें ही गायब हो चुकी होंगी।

              – सचिन पौराणिक

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