Talented View : मूर्तियों पर सियासत गलत

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अंडमान की सेल्युलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया हुआ है। पोर्ट ब्लेयर पहुंचने वाला हर पर्यटक सेल्युलर जेल जरूर पहुंचता है। आज़ादी की जंग लड़ रहे हजारों क्रांतिकारियों को यातनाएं देने के लिए सेल्युलर जेल लाया जाता था। चारो तरफ पानी के बीच बनी इस जेल को इसीलिए “कालापानी” का नाम दिया गया था क्योंकि यहां से कोई कैदी भागने की सोच भी नही सकता था। इस अंधेरी जेल में भारत के क्रांतिकारियों को अनगिनत प्रताड़नाएं दी जाती थी।

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इस जेल को 7 हिस्सों में बनाया गया था। कालान्तर में कई भाग ध्वस्त हो गए और अब सिर्फ 3 हिस्से ही इस जेल के बचे है। इन्ही में से एक जेल के दूसरे तल पर स्थित सबसे आखिर कोठी में वीर सावरकर को रखा गया था। सुनसान टापू में काले अंधेरे के बीच इस बैरक में कैसे हमारे क्रांतिकारी रात गुजारते होंगे ये सोचकर ही आत्मा कांप जाती है। इन जेलों मे हमारे क्रांतिकारियों के साथ होने वाला अमानवीय व्यवहार जानने के लिए हर शाम यहां होने वाले ‘लाइट एंड साउंड शो’ को देखना चाहिये। ये देखकर हमें पता चलता है कि हमारी आज़ादी की कितनी बड़ी कीमत हमारे बलिदानी पूर्वजों ने चुकाई है।

कल खबर आई राजधानी के दिल्ली विश्वविद्यालय से। यहां की आर्ट विंग में एबीवीपी ने रातोरात वीर सावरकर की प्रतिमा लगवा दी। इसके बाद एनएसयूआई के छात्रों ने विरोधस्वरूप सावरकर की प्रतिमा पर कालिख लगा दी और जूतों की माला पहना दी। रातोंरात बिना इजाज़त किसी की मूर्ति लगाना गलत है लेकिन विरोध का ये तरीका भी कहीं से सही नही कहा जा सकता। कभी हमारे यहां नेहरू की मूर्ति तोड़ दी जाती है कभी ईश्वर चंद्र विद्यासागर की तो कहीं सावरकर की। समझ नही आता मूर्तियों पर हम किस बात का गुस्सा निकाल रहे है?

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एनएसयूआई के युवाओं को एक बार अंडमान जाना चाहिये। वहां उस बैरक को देखना चाहिए जहां सावरकर को रखा गया था। उन यातनाओं को महसूस करना चाहिए जो हमारे क्रांतिकारियों ने झेली है। उसके बाद आप खुद निर्णय लें कि आप किसे अंग्रेजो का एजेंट मानना चाहते है और किसे नही? तेजप्रताप यादव जैसे फैंसी ड्रेस नेता, जिनके पिताजी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में है, वो अगर सावरकर को अंग्रेज़ो का एजेंट कहें और उनकी मूर्ति पर कालिख पोतने का समर्थन करें तो उनकी बुद्धि पर तरस आता है। सावरकर को छोड़कर उन्हें अपने पिताजी के कारनामों को याद रखना चाहिए जिसने जानवरों के चारे को भी भ्रष्टाचार का ज़रिया बना दिया।

एनएसयूआई वालों को समझना चाहिए कि सावरकर देशभक्त थे इसीलिए उन्हें कालापानी की सज़ा मिली। नही तो कितने ही नेताओ ने जेल में तब भी मौज की और जेल के अंदर से ही किताबें भी लिख डाली। मेरा दावा है कि अंडमान की सेल्युलर जेल के दर्शन करने के बाद कोई सावरकर के बारे में उटपटांग नही बोल पायेगा। सेल्युलर जेल सिर्फ जेल नही एक तीर्थ है जहां जाकर उस मिट्टी को हमे नमन करना चाहिए जिस मिट्टी में हमारे बलिदानी क्रांतिकारियों का खून समाया हुआ है।

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पुनः मूर्तियों पर सियासत गलत है चाहे वो नेहरू की हो, गांधी की अथवा सावरकर की। अपना जीवन देश के लिए बलिदान करने वालों को नमन हम नही कर सके, कम से कम उनकी मूर्तियों को ही नमन करके हम संतोष कर सकतें है। बलिदानियों का अपमान करके हम देश का कोई भला नही कर रहे बल्कि स्वयं का ही चारित्रिक पतन कर रहे है। सावरकर की प्रतिमा एक अपमान करने वाले एनएसयूआई के छात्रों को फिर यही सलाह है कि एक बार जरूर अंडमान की सेल्युलर जैल होकर आएं। वहां जाकर जब सच्चाई पता चलेगी तो हाथ अपने आप ही सावरकर और उनके जैसे हजारों बलिदानियों के सम्मान में जुड़ जायेंगे।

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