Talented View : न्याय व्यवस्था में बैठे लोग आखिर कब सुधरेंगे?

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दिल्ली हिंसा (Delhi Violence) मामले पर देश की सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)  ने तल्ख टिप्पणियां की। कोर्ट (Cartoon On Indian Judicial System) ने कहा कि दिल्ली पुलिस के गैर-पेशेवर रवैये के चलते ही इतनी जाने गयी। कोर्ट ने पुलिस को अमेरिका और ब्रिटेन की पुलिस की कार्यप्रणाली से सीखने की सलाह भी दी। फिर इतनी अच्छी-अच्छी बातें करने के कोर्ट ने शाहीन बाग़ (Shaheen Bagh Movement) खाली कराने पर लगी याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया और कहा की अभी सुनवाई के लिए सही समय नही है।

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खाली कारतूस चलाने के आदि हो चुके कोर्ट (Cartoon On Indian Judicial System) से यही उम्मीद थी। लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से ये सवाल कोई नही पुछ सकता कि 32 मौतों के बाद भी अगर आपको शाहीन बाग़ (Shaheen Bagh Protest) मामले पर सुनवाई के उचित समय नही लग रहा है तो क्या आपको अमेरिका और ब्रिटेन की न्यायपालिका से कुछ सीखने की जरूरत नही है? दिल्ली हिंसा में सब गलतीं पुलिस (Delhi Police) की ही है या कुछ हमारी व्यवस्था की भी है? अब बात निकली है तो सवाल पुछ ही लिया जाए कि किस देश की कोर्ट सड़क जाम कर बैठे प्रदर्शनकारियों को सख्ती से हटाने की बजाय उन्हें मनाने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजती है?

किस देश की कोर्ट (Cartoon On Indian Judicial System) एक आतंकी की फांसी रुकवाने के लिए आधी रात को खोली जाती है? किस देश की कोर्ट में बलात्कार पीड़िता (Nirbhaya Gang Rape and Murder)  की मां अपने आंसू बहाती है और अपराधियों का वकील बेशर्मी से हंसता है? किस देश की कोर्ट में छोटा सा विवाद सुलझाने में दशकों लग जातें है? किस देश के जज मीडिया के सामने आकर अपनी बेबसी का रोना रोतें है? किस देश की न्यायपालिका इतनी लाचार है कि एक नेता पर एफआईआर का आदेश देते ही जज का रातोंरात तबादला कर दिया जाता है?

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पुलिस पर सवाल खड़े करना सबसे आसान है। माना कि पुलिस में कई कमियां है (Cartoon On Indian Judicial System) लेकिन ये एक सच्चाई है कि यही पुलिस अपनी जान पर खेलकर दंगाइयों को रोकती है और शहर को सुरक्षित रखती है। पुलिस समाज की सुरक्षा के लिए कितनी बड़ी दीवार है ये इसी बात से समझा जा सकता है कि दंगाई धमकी देतें है कि 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो तो वो कत्लेआम मचा देंगे। दिल्ली पुलिस (Delhi Police) का ही हवलदार रतनलाल (Ratanlal) और एक आईबी अफसर दंगाइयों के हाथो मारा गया है। समाज की सुरक्षा की कीमत कई बार पुलिस वाले अपनी जान देकर चुकाते हैं और हम उन पर ही सवाल उठा रहे हैं?

लेकिन क्या करें, AC कमरों में बैठकर निर्णय सुनाने वाले ज़मीन से पूरी तरह कट जो चुकें है। पुलिस तो फिर भी किसी दिन पेशेवर रवैया अपना लेगी लेकिन न्याय व्यवस्था में बैठे लौग कब सुधरेंगे? बड़ी-बड़ी बातें करने वाले जज खुद का तबादला तो रुकवा नही सकते ये समाज को क्या सुधारेंगे? दिल्ली मामले (Delhi Riots 2020) में कुछ नेताओं पर एफआईआर का आदेश देते ही न्यायाधीश मुरलीधर का ही रातोंरात तबादला कर दिया गया। इस मामले ने तूल पकड़ा तो केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सामने आए और उन्होंने कहा की ये तबादला न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुआ है और किसी आदेश से इसका कोई लेना-देना नही है।

एक तथ्य ये भी है कि इस देश में सुप्रीम कोर्ट (Cartoon On Indian Judicial System) के आदेश या जजों पर टिप्पणी करने का संवैधानिक हक किसी को नही है। लेकिन ये गलत है। न्यायपालिका को आलोचना से इतना घबराना नही चाहिए। दूसरों पर टीका-टिप्पणी करने वालों को खुद इससे परे नही होना चाहिए। असलियत ये है कि जनता के मन मे न्यायपालिका और उसकी कार्यप्रणाली के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा हो चुका है। कोर्ट को किसी दूसरे को सुधारने से पहले स्वयं की कार्यप्रणाली सुधारने की सर्वाधिक आवश्यकता है। कोर्ट को ये समझना होगा कि कोर्ट और पुलिस मिलकर काम करेंगे तो ही देश का भला होगा। इस तरह पुलिस को ही कटघरे में खड़ा किया जाएगा तो कभी देश का भला नही हो सकता। बाकी एक जनहित याचिका कोर्ट को खुद लगानी चाहिए जिससे उनके जजों के यूं असमय तबादले न कर दिये जाए।

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Sachin Pauranik

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