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Talented View :  हत्या से सत्ता का दांव

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2015 में एक तस्वीर मीडिया में अचानक छा गयी थी। ये तस्वीर थी एक 3 वर्षीय बालक एलेन कुर्दी की लाश की। एलेन सीरियाई मूल का बच्चा था जो गृहयुद्ध से बचने के लिए परिवार सहित नौका से ग्रीस जाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन नौका के डूब जाने से उसमें सवार सभी लोग मारे गए। समुद्र में बहते हुए एलेन की लाश तुर्की के तट पर पहुँच गयी थी। इसका चित्र पूरे संसार मे वायरल हुआ था। इस चित्र के सुर्खियों में आने के बाद से कई देशों ने अपने दरवाजे शरणार्थियों के लिए खोल दिए थे।

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हालांकि कहने वाले ये कहतें है की इस चित्र को वायरल करने के पीछे असल मंशा शरणार्थियों के पक्ष में माहौल बनाना था जिससे दुनिया के देश इन्हें अपने यहां रहने की इजाजत दें। एलेन कुर्दी की तस्वीर देखकर भारत मे भी शरणार्थियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की गई थी लेकिन राजनैतिक माहौल अनुकूल न होने की वजह से ये दांव यहां नही चल पाया। खैर, तर्क ये है की एलेन कुर्दी की लाश पर आंसू बहाने वाले लोग बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक संघ कार्यकर्ता की सपरिवार नृशंस हत्या पर चुप्पी साधे हुए है।

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बंधु प्रकाश पाल नाम के संघ के कार्यकर्ता की उनके घर मे घुसकर हत्या कर दी गयी। उनके साथ ही उनकी 8 माह की गर्भवती पत्नी और 8 साल के बेटे की भी धारदार हथियारों से हत्या कर दी गयी। इस वारदात के चित्र इतने वीभत्स है कि देखने वालों की आंखो में आंसू आ जाये। लेकिन चूंकि इस घटना में मरने वाला वर्गविशेष से नही है इसलिए इस मुद्दे पर अवार्ड वापसी गैंग, असहिष्णुता ब्रिगेड, उदारवादी, मानवतावादी और लिंचिंग लॉबी ने अपनी आंखों और मुह पर पट्टी बांध ली है। मरने वाला संघ का कार्यकर्ता है इसलिए इस घटना को ‘लिंचिंग’ कहकर हल्ला मचाने वाले गायब हो गए है। प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने वाले बुद्धिजीवी भी अब खामोशी की चादर ओढ़कर सो गए है।

ममता सरकार अपने राज्य में होने वाली ऐसी घटनाओं को रोकने में पूरी तरह नाकाम है। राजनीतिक हिंसा और हत्याएं बंगाल की राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन गयी है। खून की राजनीति का बेशर्म खेल राज्य में खेला जा रहा है और मुख्यमंत्री को इससे कोई फर्क नही पड़ रहा है। फर्क तो केंद्र में बैठी सरकार को भी नही पड़ रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि इन घटनाओं से उनकी राज्य में सत्ता प्राप्ति की डगर आसान हो जाएगी। अपने कार्यकर्ताओं की हत्या पर संघ भी निंदा से आगे बढ़कर कुछ करने के मूड में नज़र नही आता है।

सवाल केंद्र, राज्य, संघ, मानवतावादी, बुद्धिजीवियों सभी से है की इंसान की जान की कोई कीमत है या नही? एक व्यक्ति का पूरा परिवार निर्ममता से काट दिया जाता है और इस पर कोई आवाज़ उठाने को तैयार नही? क्या संघ का कार्यकर्ता होना देश मे गुनाह हो गया है? संघ अगर अपने कार्यकर्ताओं की सुरक्षा नही कर पा रहा है ऐसे में कौन जुड़ेगा संघ से? संघ के कार्यकर्ता मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री तक बन रहे है, उसके बाद भी कार्यकर्ताओं की हत्याएं नही थम रही तो इसका दोष किस पर मड़े? देशभक्ति के नाम पर संघ से जुड़ने वाले युवाओं की हत्या के बाद उनके परिवार का ख्याल कौन रखेगा? इस दिशा में संघ ने कभी सोचा है?

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एलेन कुर्दी की लाश पर आंसू बहाने वालों को क्या मुर्शिदाबाद का ये नज़ारा आंसू बहाने और आवाज़ उठाने लायक नही लगता? 8 महीने की गर्भवती और 8 साल के बच्चे की गर्दन काटने वाले हैवान कौन है? इन्हें पकड़कर चौराहे पर फांसी क्यों न दी जाए? हालात सम्हालने की जिम्मेदारी जिनके ऊपर है उन्हें राजनीतिक रोटियां सेंकने से फुरसत नही मिल रही है। बहरहाल, मुर्शिदाबाद की इस घटना से अवार्ड वापसी, असहिष्णुता और लिंचिंग गैंग की सच्चाई एक बार फिर सामने आ गयी है। ये लोग किसी को इंसाफ दिलाने के लिए नही बल्कि एक विशेष एजेंडे के तहत ही सक्रिय होतें है। जनता इनकी असलियत को समझे और इनके झांसे में आने से बचें।

– सचिन पौराणिक

 

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