अवसर के अभावों में देश की जवानी बर्बाद

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एक मित्र के मित्र का चयन जिला कोर्ट में चतुर्थ श्रेणी भृत्य के पद पर हुआ। बंदा अभी परमानेंट नहीं हुआ है और तनख्वाह भी मात्र 7 हजार महीना है, लेकिन वह बड़ा खुश रहने लगा है। मित्र का कहना है कि परमानेंट होने के बाद उसकी तनख्वाह 15 हज़ार के लगभग हो जाएगी, लेकिन उसकी खुशी का राज़ अलग है।

बात दरअसल यह है कि यहां कोर्ट में भृत्य की ऊपर की कमाई रोज़ की 1हजार रुपए की हो जाती है। फाइल ऊपर-नीचे करने से लेकर फरियादियों की पेशी और जज साहब से मिलने का समय दिलाने तक के पैसे फिक्स हैं। तनख्वाह मिले न मिले उसकी यहां किसी को फिक्र ही नहीं है, ऊपर की कमाई से ही सब चल रहा है। जज साहब की नाक के नीचे यह सब चलता है और उनकी मौन सहमति इस काम में होती है। सरकारी महकमे में एक मामूली भृत्य की कमाई के ये हाल हैं तो बाबू और बड़े अधिकारी क्या करते होंगे, यह समझा जा सकता है। शायद यही वजह है कि सरकारी नौकरी के लिए आजकल के युवा लार टपकाते फिरते हैं।

आए दिन अखबारों में सरकारी अधिकारियों के काले कारनामों की खबरें छपती रहती है। कभी नगर निगम का मामूली बेलदार करोड़ों की संपत्ति का आसामी निकल जाता है तो कभी कोई पटवारी धनकुबेर निकल जाता है। कुछ हजार रुपए महीना कमाने वाले कर्मचारी भी किलो से सोना और कई घर-जमीन के स्वामी निकल आते हैं। केंद्रीय कर्मचारियों के भ्रष्टाचार के 2-3 किस्से तो हर इंसान अपनी स्मृति और अनुभव से सुना सकता है। सरकार चाहे भ्रष्टाचार को लेकर कितने ही दावे कर ले, लेकिन हकीकत यही है कि भ्रष्टाचार कम नहीं सिर्फ महंगा हुआ है। पहले सौ के कुछ नोट जो काम कर देते थे वही काम अब 2000 का नोट कर रहा है। आज भी नगर निगम, श्रम विभाग, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग और उद्योग विभाग जैसे मलाईदार विभागों में कोई काम लक्ष्मीदर्शन के बिना नहीं हो सकता है। भ्रष्टाचार की यह काली कमाई युवाओं को कितना आकर्षित करती है, इसकी बानगी उत्तरप्रदेश में देखने को मिल रही है।

यूपी में पुलिस विभाग के चतुर्थ श्रेणी संदेशवाहक अर्थात प्यून के 62 पदों पर नियुक्ति के लिए 93 हजार आवेदन आए हैं। इनमें 50 हजार ग्रेजुएट, 28 हजार पोस्ट ग्रेजुएट और 3700 पीएचडी डिग्रीधारी हैं। इनके अलावा हजारों आवेदक बीटेक और एमबीए की डिग्री प्राप्त कर चुके हैं। हालांकि इस पोस्ट के लिए न्यूनतम योग्यता मात्र 5वीं पास और साइकिल चलाना है, लेकिन बड़ी संख्या में आए उच्च शिक्षित युवाओं के आवेदन इस बात का सबूत हैं कि सरकारी महकमे में कमाई के अवसर सबसे अधिक हैं।

ये आंकड़े मुद्रा योजना, स्टार्टअप योजना और स्किल इंडिया जैसी योजनाओं की सार्थकता पे सवाल उठाने के लिए काफी है। पुलिस महकमे के इस पद हेतु शुरुआती वेतन बीस हजार रुपए रखा गया है, लेकिन ऊपर की बेतहाशा कमाई के अवसर के चलते युवा इसके पीछे दीवाने हो रहे हैं। मात्र 62 पदों के लिए आए 93 हजार आवेदन सरकार को मुंह चिढ़ाते पूछ रहे हैं कि देश में बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार की वास्तविक स्थिति क्या है? सरकारी महकमों में हो रहे भ्रष्टाचार पर सरकार की नज़र क्यों नहीं पड़ती, यह बात समझ से परे है।

सवाल है कि देश का उच्च शिक्षित युवा चतुर्थ श्रेणी भृत्य के पद के लिए इतना दीवाना आखिर क्यों हो रहा है? ज्यादा पैसे कमाने के अवसर इसकी वजह है या सच में ही बेरोजगारी इतनी ज्यादा है? ये आंकड़े डराने वाले तो हैं ही समाज की वास्तविक स्थिति को दिखाने के लिए भी पर्याप्त हैं।

विचारणीय स्थिति है कि पीएचडी डिग्री प्राप्त करने वाला उच्च शिक्षित युवा यदि भृत्य बनने के लिए खुशी-खुशी राज़ी हो रहा है तो हमारा समाज आखिर किस दिशा में जा रहा है? क्या हमारा शिक्षा तंत्र फेल हो चुका है या सरकारें फेल हो चुकी हैं? इतनी बड़ी तादाद में यदि युवा बेरोजगार घूम रहे हैं तो देश कैसे आगे बढ़ेगा?  इस बेरोज़गारी का ही दुष्परिणाम यह निकलता है कि खाली बैठा यही युवा फिर कभी आरक्षण के समर्थन में सड़कों पर उतरता है तो कभी आरक्षण के विरोध में तो कभी ग़लत राह पकड़ लेता है।

युवाशक्ति भारत में जिस तरह काम के अभाव में बर्बाद हो रही है, उस हिसाब से देश के विकास में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न होगी। कोई देश कैसे विकास की राह पर आगे बढ़ सकता है, जब उस देश का पढ़ा-लिखा युवा ही बिना काम के घूम रहा है। भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन अवसर के अभावों में देश की जवानी बर्बाद हो रही है। यह स्थिति विस्फोटक हो चुकी है, लेकिन रोम जल रहा है और नीरो बंसी बजाने में व्यस्त है।

-सचिन पौराणिक

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