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Talented View : उम्मीद पर ही दुनिया कायम है..!

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एक मित्र, जो पेशे से सिविल इंजीनियर हैं, भाजपा की हर रैली में शामिल होते थे। इस बार भाजपा की रैली में वे शामिल नहीं हुए तो मैंने आश्चर्य से पूछा कि इस बार क्या हुआ, जो आप रैली में नहीं पहुंचे? दु:खी मन से दोस्त ने उत्तर दिया कि अब कोई मतलब नहीं राजनीति से। सारे नेता चोर है। उन्हें थोड़ा कुरेदते हुए मैंने विस्तार से जानना चाहा कि आखिर हुआ क्या? तब उन्होंने बताया कि कितनी भी रैलियों में शामिल हो जाओ, ये लोग किसी के सगे नहीं है। हर काम में शहर की ईमानदार महापौर का 10% हिस्सा फिक्स है। इसके अलावा सरकारी बाबुओं को भी पैसा रिलीज़ करने के लिए प्रसाद चढ़ाना पड़ता है। सिटी इंजीनियर और आयुक्त का भी ध्यान ठेकेदार को रखना पड़ता है। इन सबके बाद जिस वार्ड में काम होता है, वहां का पार्षद भी 10 से 20% कमीशन की डिमांड करता है। इस तरह पैसा बंटते-बंटते कुल बजट का करीब 50% ही पैसा ही असल कामों में खर्च हो पाता है। अब ऐसी परिस्थितियों में कैसे अच्छी सड़क बन सकती है? कैसे अच्छे निर्माण कार्य हो सकते हैं? भाजपा से जुड़े इंजीनियर या ठेकेदार को भी इन खर्चों में कोई रियायत नहीं दी जाती है।

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ये हालात तब हैं, जब तमाम नेता, अधिकारी अपने आप को ईमानदार समझ रहे हैं। यह कहते हुए मित्र की आंखों में निराशा साफ झलक रही थी। बात बिल्कुल सच है। नेता भाजपा के हो या कांग्रेस के हालात एक जैसे ही है। नेताओं के अलावा भ्रष्ट अधिकारी भी पैसा बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। ऐसे ही मेरे एक मित्र, जो केंद्र सरकार के एक मंत्रालय में अधिकारी है। उनका बीते साल नई कार खरीदने का विचार था, लेकिन पैसों की तंगी की वजह से उन्होंने प्लान केंसल कर दिया, लेकिन महज एक वर्ष के भीतर ही उस मित्र ने न सिर्फ एक नई कार खरीदी बल्कि 2 प्लॉट शहर की पॉश कॉलोनी में भी खरीद डाले। इसके अलावा उनके जीवन स्तर में भी इस एक साल में हैरतंगेज बदलाव आए। ‘सिर्फ तनख्वाह’ में यह सब होना नामुमकिन था। उनके अधीनस्थ कर्मचारी ने बताया कि रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई करने के ठेकों में साब ने बहुत माल कमाया है।

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ऐसे हालात हैं इस समय देश में कि सरकारी महकमों का छोटा-मोटा बाबू भी करोड़ों का आसामी बना बैठा है। बड़े अधिकारियों की संपत्ति की ईमानदारी से जांच हो जाए तो पता चलेगा कि ये लोग सिस्टम को कितना खोखला कर चुके हैं। इधर, नेताओं की तो बात करना ही बेमानी है। एक बार पार्षद बनने वाला छुटभैय्या नेता भी अपने आने वाली पीढ़ी की व्यवस्था कर जाता है। नगर पालिका अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष-सचिव, विधायक, महापौर, सांसद, मंत्रियों के ठाठ की चर्चा करना शुरू करेंगे तो धरती की सबसे बड़ी किताब बन जाएगी। सोचने वाली बात है कि इस देश में भ्रष्टाचार आखिर कैसे खत्म हो सकता है, जब भ्रष्टाचार रोकने की बात करने वाले खुद ही इस कीचड़ में सने हुए हैं? नेता इस देश से भ्रष्टाचार मिटा देंगे, यह सोचना भी बचकाना है। एक पार्षद का चुनाव लड़ने में करीब 5 से 10 लाख का खर्च आता है। महापौर का चुनाव लड़ने में लगभग 1 करोड़, विधायक में 1 से 2 करोड़ और सांसद के चुनाव में 5 करोड़ तक का खर्च होता है। ये आंकड़े अनुमानित ज़रूर हैं, लेकिन तब भी न्यूनतम है। हकीकत में इससे कई गुना ज्यादा पैसा नेता चुनाव में खर्च कर डालते हैं।

विचारणीय है कि ये पैसा आखिर कहां से आता है और इस पैसे की पूर्ति कहां से होती है? लाखों की भीड़ जिन रैलियों में दिखाई देती है, वह भीड़ 200-300 रुपए और खाने के पैकेट के लालच में आई होती है। बेचारे मजदूरों को पता भी नहीं होता है कि रैली किस पार्टी और किस नेता की है? उनके लिए चुनावी रैली सिर्फ दिहाड़ी और एक वक्त के खाने का इंतज़ाम होता है। चुनाव आयोग ने चुनाव में खर्च करने की जितनी सीमा प्रत्याशियों के लिए तय कर रखी है, उससे ज्यादा खर्च तो 1 या 2 रैलियों में ही कर दिया जाता है। ऐसी भीड़ जुटाने के बाकायदा ठेकेदार है, जो भीड़ की संख्या के हिसाब से पैसा नेताओं से चार्ज करते हैं।

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इतना काला धन खर्च करने के बाद चुनाव जीतने वाला नेता अगर कहता है कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ेगा तो उस पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है। भ्रष्टाचार हम भारतीयों के चरित्र में रच-बस गया है। आज के दौर में ईमानदार वही है, जिसे बेईमानी करने का उचित मौका या कीमत नहीं मिल पा रही है। लेकिन हां, कुछ अधिकारी, कर्मचारी और नेता आज ऐसे भी हैं, जो देश के लिए काम करते हैं और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं। ऐसे लोगों के कंधे पर ही करोड़ों जनता की उम्मीद टिकी हुई है। एक उम्मीद देश की जनता के मन में अब भी है कि कभी तो इन भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों की सम्पत्तियों की निष्पक्ष जांच होगी और उन्हें उनके गुनाहों की सज़ा मिलेगी। कहते हैं कि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है..!

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