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Talented View : कांग्रेस को भाजपा से सीखने की ज़रूरत है

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गुलाबजामुन में न गुलाब होता है और न ही जामुन फिर भी उसे गुलाबजामुन ही कहा जाता है। वैसे ही कल राहुल गांधी के त्यागपत्र में न कहीं त्याग था और न ही वो पत्र था। राहुल गांधी की चिट्ठी में अगर कुछ था तो वह थी, भड़ास। राहुल ने अपने 4 पन्नों के खत में भाजपा, संघ, संवैधानिक संस्थाओं से लेकर कांग्रेस के नेताओं तक ने अपनी भड़ास खुलकर निकाली है। अपने “भड़ास पत्र” में राहुल गांधी का दर्द कई बार झलका।

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उनका मानना था कि कांग्रेस की लड़ाई वे अकेले ही लड़ रहे हैं।  एक महीने पहले करीब जब कांग्रेस अध्यक्ष के इस्तीफे की सुगबुगाहट हुई, तब राहुल को उम्मीद थी कि उनके इस कदम से कांग्रेस में इस्तीफों का दौर शुरू हो जाएगा, लेकिन कांग्रेस के पदाधिकारियों ने उन्हें मनाने की तो पुरजोर कोशिश की किन्तु अपनी तरफ से किसी ने इस्तीफा नहीं दिया। लगता है कि कांग्रेस नेताओं के इस व्यवहार ने राहुल गांधी को झकझोर दिया। आखिरकार थोड़ी बेशर्मी दिखाते हुए राहुल को खुद कहना पड़ा कि उन्होंने सोचा था कि कांग्रेस नेता हार की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफे देंगे। उनके इतना कहने के बाद कांग्रेस में इस्तीफों की नौटंकी शुरू हो गई।

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पार्टी पदाधिकारियों से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों तक ने राहुल से मिलकर इस्तीफ़े की पेशकश की, लेकिन राहुल यह समझ चुके थे कि ये सब एक ड्रामे से ज्यादा कुछ नहीं है। राहुल यह भी समझ चुके थे कि जब वे प्रदेशों में अपनी पसंद के मुख्यमंत्री (ज्योतिरादित्य और सचिन पायलट) तक नहीं बनवा पा रहे हैं तो उनके अध्यक्ष पद पर बने रहने का भी कोई तुक नहीं है। इसके अलावा राहुल अमेठी से अपनी सीट हारकर भी अध्यक्ष पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो चुके थे। अब जबकि राहुल साफ कर चुके हैं कि पार्टी का अगला अध्यक्ष गांधी परिवार का नहीं होगा, तब कांग्रेस के सामने असली चुनौतियां आने वाली हैं। अब तक कांग्रेस में तरक्की का पहला उसूल ही “रीढ़विहीन” होना थाइसलिए उनके पास ऐसे नेताओं की अत्यधिक कमी हो चुकी है, जो चाटुकारिता से आगे बढ़कर पार्टी को नेतृत्व दे सकें।

राष्ट्रीय स्तर पर एक भी ऐसा नेता उनके पास नहीं है, जिसके नाम पर सर्वसम्मति बनाई जा सके। कांग्रेस की हालत उस जहाज जैसी हो गई है, जिसमें सवार सभी को लग रहा है कि जहाज डूबने वाला है इसलिए यहां भगदड़ मची हुई है। महज़ दूसरा चुनाव लगातार हारने पर कांग्रेस में मची भगदड़ से यह स्पष्ट है कि इनके नेताओं के पास सब्र नही है। आज भी कांग्रेस इकलौती पार्टी है जो भाजपा को टक्कर दे सकती है। लेकिन सत्ता की ऑक्सिजन नही मिलने के कारण इनके नेता सुस्त हो चुके है। कांग्रेस के पास सत्ता वापसी करने का कोई रोडमैप नही है। उनके नेता आज भी किस्मत के भरोसे ही बैठकर सत्ता बदलने का इंतज़ार करना, सड़क पर उतरकर संघर्ष करने के मुकाबले बेहतर समझ रहे है।

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बेहतर होता अगर राहुल नेतृत्व की कमान संभालते हुए कांग्रेस कार्यसमिति को भंग करते, बुजुर्ग नेताओं से पल्ला झाड़ते और देशभर से युवा चेहरों को इसमें जगह देते, लेकिन जब राहुल खुद ही पलायन कर रहे हैं तो उनके कार्यकर्ताओं में जोश कैसे आ सकता है? एक परिवार के भरोसे राजनीति करने का यही परिणाम निकलता है। एक तरफ भाजपा है, जो मात्र 2 सीटें होने के बाद भी कभी पीछे नहीं हटी और दूसरी तरफ कांग्रेस है, जिनके 50 से ज्यादा सांसद होने के बाद भी नेतृत्व में भागमभाग मची हुई है। इस मामले में कांग्रेस को भाजपा से सीखने की ज़रूरत है।

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