Talented View : लगता है कांग्रेस के बुरे दिन अभी लंबे चलने वाले हैं

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बड़े-बुज़ुर्ग कहते आए हैं कि चाहे किसी से कितना ही झगड़ा कर लो, लेकिन बोलचाल बंद नहीं होना चाहिए क्योंकि झगड़े सुलझ सकते हैं, मनमुटाव दूर किए जा सकते हैं बशर्ते बोलचाल चलती रहे। आपने भी महसूस किया होगा कि यदि बातचीत चलती रहती है तो झगड़ा ज्यादा दिन चल ही नहीं  सकता क्योंकि बातचीत असल में वह दरवाजा है, जिससे सारे गिले-शिकवे भगाए जा सकते हैं, लेकिन अगर बातचीत ही बंद हो जाए तो फिर झगड़े पुश्तैनी बन जाते हैं।

Talented View : राहुल प्रधानमंत्री मोदी से सीख सकते हैं

कल यह खबर आई थी कि कांग्रेस ने एक महीने के लिए अपने सभी प्रवक्ताओं को टीवी बहस में शामिल होने के लिए मना कर दिया है। रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया कि एक महीने के लिए हमने कांग्रेस के सभी प्रवक्ताओं को टीवी बहस में शामिल नहीं  होने के लिए कहा है। संपादक और एंकर से भी निवेदन है कि वे कांग्रेस से किसी को भी बहस में शामिल न करे। कांग्रेस के इस स्टैंड से पहले समाजवादी पार्टी ने भी लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद अपने सभी प्रवक्ताओं को पद से हटा दिया था।

एक तरफ देश प्रधानमंत्री मोदी को दूसरी बार शपथ लेते देखने के लिये उत्साहित है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के ऐसे रवैये को देखकर लगता है कि वह कितने आंतरिक झंझावात के दौर से गुज़र रही है। कल ही ममता बनर्जी ने भी केंद्र पर आरोप लगाते हुए शपथ ग्रहण में शामिल होने से इनकार कर दिया है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का ऐसा चरित्र स्वस्थ लोकतंत्र में कतई शोभा नहीं देता है। मीडिया के सामने अपना पक्ष रखने के बजाय बहस से भागना आखिर क्या दर्शाता है? क्या कांग्रेस के पास कोई ढंग का प्रवक्ता नहीं बचा है, जो अपनी बात बिना लाग-लपेट के स्पष्ट शब्दों में रख सके? कांग्रेस की बात सही हो सकती है कि मीडिया का रुख भाजपा के प्रति नरम है, लेकिन 2014 से पहले यही मीडिया कांग्रेस के सुर में सुर मिलाया करती थी।

Talented View : एकतरफा प्यार ज्यादा दिन नहीं चलता है…

कांग्रेस के नेताओं ने भी कई मीडिया चैनलों में निवेश कर रखा था और ये चैनल उस दौर में कांग्रेस के प्रवक्ता बना करते थे। आज जो स्थिति कांग्रेस प्रवक्ताओं के साथ बन रही है, वह उस दौर में भाजपा प्रवक्ताओं के साथ बना करती थी। तब कांग्रेस वाले टीवी बहसों में एंकर के साथ मिलकर भाजपा को घेरा करते थे, लेकिन तब भी अपना संयम बरकरार रखने के लिए भाजपा नेताओं की दाद देना होगी।  आज कांग्रेसी प्रवक्ता मीडिया वालों पर ऐसी अभद्र टिप्पणियां करते हैं, जो यहां लिखी भी नहीं  जा सकती हैं।

राजीव त्यागी, रागिनी नायक, आलोक शर्मा और पवन खेड़ा जैसे प्रवक्ता भाजपा के साथ ही मीडिया पर भी अपमानजनक टिप्पणियां करने से बाज़ नहीं आते। ये लोग बहुत जल्दी आपा खो बैठते हैं और उलजुलूल बकना शुरू कर देते हैं। जनता इन्हें सुनकर अनजाने में ही कांग्रेस को वोट न देने का निश्चय कर बैठती है और जो प्रवक्ता समझदारी और सारगर्भित टिप्पणियां कांग्रेस के लिए किया करते थे, उनको पार्टी में सम्मान ही नहीं दिया गया। शहजाद पूनावाला और प्रियंका चतुर्वेदी इसके उदाहरण हैं। अपनी अंदरूनी कलह से जूझ रही कांग्रेस का यह कदम यह दर्शाता है कि वह कितनी असहाय हो चुकी है।

“पर उपदेश कुशल बहुतेरे” का उदाहरण हैं राहुल

आज की कांग्रेस के पास न नीति है न नीयत है और न ही नेता है। ऊपर से जिस दरवाज़े यानी मीडिया द्वारा वे अपनी बात कह सकते थे| अब वे उन्हीं दरवाज़ों को बंद करने पर आमादा हैं। मीडिया में गैर-मौजूदगी से यही संदेश जाएगा कि कांग्रेस जनता से कोई संवाद नहीं रखना चाहती है। कांग्रेस और जनता के बीच के सेतु को कांग्रेस खुद आग लगाना चाहती है। जनता और कांग्रेस के बीच संवाद कायम नहीं रहता है तो कांग्रेस दशकों तक पुनः सत्ता में वापसी नहीं कर पाएगी। लगता है कांग्रेस के बुरे दिन अभी लंबे चलने वाले हैं।

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