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Talented View : आज देश में “गैर भाजपावाद” की बुनियाद खड़ी होने लगी

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देश में एक दौर था, जब “गैर कांग्रेसवाद” का चलन हुआ करता था। लाख आपसी झगड़ों के बावजूद कांग्रेस के अलावा सभी पार्टियों को एक ही समझा जाता था। इसका कारण यही था कि सभी दलों का मकसद एक ही था कि कैसे भी करके कांग्रेस को सत्ता से हटाना है। बदलते वक्त के साथ आज ये हालात हो चले हैं कि कांग्रेस की तर्ज़ पर आज देश में “गैर भाजपावाद” की बुनियाद खड़ी होने लगी है। परस्पर विरोधी विचारधाराओं के दल आपस में एक हो रहे है तो सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए।

Talented View : नेताओं का पक्का इलाज़ सिर्फ जनता के पास

Today Cartoon On Shatrughan Sinha :

बीते कई सालों से भाजपा में रहकर अपने नेतृत्व के ही खिलाफ आवाज़ बुलन्द कर रहे “शॉटगन” शत्रुघ्न ने कुछ दिन पहले भाजपा छोड़कर कांग्रेस जॉइन कर ली। राजनीति का गणित कुछ ऐसा होता है कि नेतृत्व से लाख मनमुटाव के बाद भी शत्रु ने पार्टी तब छोड़ी, जब उनका टिकट काट दिया गया। पटना साहिब से टिकट पक्का होने पर ही उन्होंने कांग्रेस जॉइन की। इसके बाद आश्चर्य इस बात पर हुआ कि उनकी पत्नी समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई और उन्हें महागठबंधन ने लखनऊ से उम्मीद्वार भी बना दिया। शत्रु के कांग्रेस में शामिल होने से ज्यादा शत्रुपत्नी का समाजवादी पार्टी में शामिल होना चौंकाने वाला है।

लखनऊ से कांग्रेस के टिकट पर आचार्य प्रमोद कृष्णन चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला यहां देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह से है, लेकिन शत्रुपत्नी के भी इस रण में शामिल हो जाने से कांग्रेस की राह यहां मुश्किल हो गई है। लखनऊ की सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी यहीं से चुनाव लड़ा करते थे। उनके जाने के बाद भी यह सीट भाजपा का गढ़ बनी रही।

Talented View : जनता है कि समझने को तैयार ही नहीं है

इस बार लखनऊ से त्रिकोणीय मुकाबला होने की वजह से लगता है कि राजनाथसिंह की इस बार भी जीत पक्की है। गैर-भाजपावाद के इस दौर में पार्टियां मोदी को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई दे रही हैं। यूपी में सांप-नेवले जैसी दुश्मनी रखने वाले सपा-बसपा एकजुट हो गए तो आम आदमी पार्टी भी पंजाब, दिल्ली, हरियाणा में कांग्रेस से गठबंधन करने को बेकरार दिखाई दे रही है। गैर भाजपावाद को व्यावहारिक बनाने के लिए कई सीटों पर आत्मघाती कदम भी उठाए जा रहे हैं। लखनऊ की सीट ऐसा ही एक उदाहरण है,

जहां कांग्रेस और महागठबंधन दोनों ने एक-दूसरे की हार की इबारत पहले ही लिख दी है। लखनऊ में भाजपा पहले ही मजबूत है, लेकिन इसके बाद भी उन्हें हराना है तो इस बात का ध्यान रखना होगा कि विरोधी वोटों का बिखराव न हो, लेकिन कांग्रेस और महागठबंधन, दोनों के दमदार प्रत्याशियों की वजह से विरोधी वोटों का बिखराव तय है। ऐसे में भाजपा की जीत लगभग तय हो चुकी है, लेकिन कांग्रेस की लाचारी देखिए कि वे शत्रुघ्न सिन्हा से यह भी नहीं कह पा रहे हैं कि वे अपनी पत्नी को लखनऊ से चुनाव लड़ने से रोकें। कितने अचरज की बात है कि शॉटगन कांग्रेस से तो उनकी पत्नी सपा से चुनाव में ताल ठोक रहे हैं।

सिर्फ यूपी-बिहार में ही बीसियों सीटें ऐसी हैं, जहां विरोधी वोटों के बिखराव के कारण भाजपा का जीतना पक्का है। बेगूसराय से देशद्रोह के आरोप झेल रहे छात्र नेता कन्हैया कुमार सीपीआई के टिकट से लड़ रहे हैं। उनकी टक्कर भाजपा के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह और राजद प्रत्याशी तनवीर हसन से है। कन्हैया के समर्थन में फ़िल्म कलाकार से लेकर कई बड़े नेता उतर आए हैं, लेकिन उनकी जीत में फिर भी संशय है। मुस्लिम वोट तनवीर हसन और कन्हैया के बीच बंट जाएंगे और इसका सीधा फायदा गिरिराज को मिलेगा।

Talented View : सेना और कलाकार करें मोदी पर प्रहार

कहने का तात्पर्य इतना ही है कि यह “गैर-भाजपावाद” भाजपा की बढ़ती ताकत को दर्शा रहा है, लेकिन भाजपा को रोकने की रणनीति बनाने में विपक्ष पूरी तरह फेल हो चुका है। भाजपा को रोकने के लिए आत्मघाती कदम तक उठाने को तैयार पार्टियां रणनीतिक सूझबूझ दिखाने में पूरी तरह विफल रही हैं। लखनऊ, बेगूसराय जैसी सीटों पर विपक्ष आपसी कशमकश में ही उलझकर भाजपा को फायदा पहुंचा रहे हैं। भाजपा को रोकने का कोई कारगर रास्ता किसी दल के पास दिखाई नहीं दे रहा है। 2019 का चुनाव विपक्ष के लिए अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई बन गया है, जिसमें वे हारते दिखाई दे रहे हैं।

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