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Talented View : कांग्रेस वालों की हालत हार का डर तो नहीं

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मंडन मिश्र और आदि शंकराचार्य दोनों अपने समय के धुरंधर शास्त्र ज्ञाता थे। उस ज़माने में जब भी दो विद्वान साथ होते थे तो वे शास्त्रार्थ किया करते थे। शास्त्रार्थ में जो जीतता था, उसे बड़ा विद्वान मान लिया जाता था। ऐसे ही एक बार शंकराचार्य और मंडन मिश्र में शास्त्रार्थ शुरू हुआ। विजेता का निर्णय करने के लिए मंडन मिश्र की धर्मपत्नी उभय भारती को चुना गया। वे खुद भी शास्त्रों की ज्ञाता थीं। चूंकि दोनों विद्वान ही विद्वत्ता में कम नहीं थे इसलिए शास्त्रार्थ कई दिनों तक लगातार चलता रहा।

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मंडन मिश्र के बारे में कहा जाता है कि उनके घर का पालतू तोता भी संस्कृत के श्लोक बोलता था जबकि आदिगुरु शंकराचार्य की विद्वत्ता का भारत में लोहा माना जाता था। मंडन मिश्र की पत्नी दोनों विद्वानों के तर्क सुन रही थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अचानक उन्हें कोई अत्यावश्यक कार्य के लिए बाहर जाना पड़ा। उनकी अनुपस्थिति में हार-जीत के निर्णय लिए जाने से पहले दोनों के गले में ताज़े फूलों की एक माला पहना दी। सबसे कह दिया कि मेरी अनुपस्थिति में ये माला शास्त्रार्थ की हार-जीत तय करेगी।

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कुछ घंटों में भारतीजी लौट आईं| तब लोगों ने उनसे पूछा देवीजी ! अब आप कैसे पता करेंगी कि कौन जीता और कौन हारा? भारती ने दोनों के गले में डाली फूलों की माला का निरीक्षण किया और शंकराचार्य को विजयी घोषित कर दिया। उनके इस निर्णय से सभी हैरान रह गए। सभी ने पूछा कि फूल भला कैसे शास्त्रार्थ में हार-जीत तय कर सकते हैं ? तब भारतीजी ने कहा, -“जब कोई विद्वान शास्त्रार्थ में हारने लगता है तो उसे स्वाभाविक तौर पर गुस्सा आने लगता है। मेरे पति के गले में फूलों की माला इस क्रोध की वजह से मुरझा गई जबकि शंकराचार्य के गले में फूल अब भी ताज़ा है।” उनकी बात सुनकर सभी ने इस निर्णय को शास्त्रसम्मत मानकर भारती की प्रशंसा की।

यह कहानी इसलिए आज याद आ गई क्योंकि वक्त बेशक आज पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन कुछ मूल सिद्धांत कभी नहीं बदलते। आज भी बहस, तर्क-वितर्क में जब भी कोई हारने लगता है तो वह गुस्से से भर जाता है। राजनीतिक बहस में तो यह गुस्सा आजकल सारी हदें पार करता जा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा ने एक लाइव टीवी शो के दौरान गुस्से में आकर भाजपा प्रवक्ता पर पानी से भरा गिलास फेंक दिया। आलोक शर्मा इस बात से आहत थे कि भाजपा प्रवक्ता उन्हें लगातार ‘गद्दार’ बोल रहे थे। हालांकि आलोक शर्मा को तुरंत अपनी गलती का अहसास भी हो गया और उन्होंने अपने इस कृत्य के लिए माफी भी मांग ली। कांग्रेस के प्रवक्ताओं का इस तरह आपा खोना आजकल आम हो चला है।

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राजीव त्यागी, अखिलेश सिंग, रागिनी नायक, संजय निरुपम, पवन खेड़ा और अब आलोक शर्मा जैसे कांग्रेस के प्रवक्ता लगातार हर चैनल की डिबेट में बदतमीजी करते आ रहे हैं। यह बात सही है कि भाजपा प्रवक्ता का आलोक शर्मा को ‘गद्दार’ कहना गलत था, लेकिन भाषाई असभ्यता का जवाब इस तरह देना बिल्कुल मुनासिब नहीं है। टीवी बहसों में कांग्रेस प्रवक्ता आजकल मर्यादा की हद निरन्तर लांघते जा रहे है। एंकर से लेकर भाजपा प्रवक्ता तक सभी से बेहूदगी भरा व्यवहार ये लोग करने लगे हैं। वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन एक आम दर्शक तो हरकतें देखकर कांग्रेस के बारे में अच्छी राय नहीं बनाता है ।

भाजपा वाले अगर भड़का भी रहे हैं तो कांग्रेसी प्रवक्ताओं को भड़कना ज़रूरी तो नहीं है। गाली-गलौच, धमकियां, बेहूदगी से जनता में बहुत जल्दी नकारात्मक भाव आ जाता है। टीवी बहसों में कांग्रेस के प्रवक्ता गुस्से से लाल-पीले होते हैं तो भाजपा वाले मंद-मंद मुस्कुराते हैं। कांग्रेस वालों की हालत देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि ये लोग लड़ाई हार चुके हैं। मंडन मिश्र की पत्नी की तरह निर्णायक की कुर्सी पर बैठी जनता भाजपा को विजयी घोषित कर चुकी है। कांग्रेस की फूलों की माला सूख चुकी है और जनता के सामने वे पराजित दिखाई देने लगे हैं।

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