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गलत नीतियां कांग्रेस की सबसे बड़ी कमज़ोरी

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सालभर पहले तक भी किसी ने कभी सोचा था कि राहुल गांधी अमेठी से हार सकते हैं? किसी ने यह कल्पना भी की थी कि गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया जा सकता है? कोई अंदाज़ भी नहीं लगा सकता था कि दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी दिल्ली की सातों सीटों पर तीसरे नम्बर पर आएगी ? किसने सोचा था कि विपक्षी एकता को एकसूत्र में पिरोने के लिए दिन-रात एक करने वाले चंद्रबाबू नायडू अपने राज्य में ही बुरी तरह परास्त हो जाएंगे ? किसी सर्वे वाले को ख़बर नहीं थी कि राजस्थान, बंगाल, गुजरात, आंध्र, हिमाचल जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस शून्य से आगे नहीं खिसक पाएगी?

क्षेत्रीय क्षत्रपों की बात करें तो यह सवाल लगातार बना हुआ है कि उनका जो नुकसान इस चुनाव में हुआ है, उससे वे कभी उबर भी पाएंगे या नहीं ? वाम दल, एनसीपी, राष्ट्रीय जनता दल, आम आदमी पार्टी, तेलगुदेशम पार्टी, पीडीपी, टीएमसी जैसी पार्टियों ने इतने बड़े पैमाने पर नुकसान उठाया है, जो इनके लिए असहनीय है। भाजपा 300 पार पहुंच गई, कांग्रेस ने भी अपनी कुछ सीटें बढ़ाने में कामयाबी पाई है।

असल मे यह नुकसान इन क्षेत्रीय दलों को ही पहुंचा है। इन दलों का जनाधार बहुत तेज़ी से खिसका है। यूपी में महागठबंधन बनाकर मोदी को रोकने में सपा-बसपा भी बुरी तरह फेल हुए। यादव कुनबा डिंपल की सीट तक नहीं बचा पाया। मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां मोदी की महासुनामी के आगे कई कांग्रेसी दिग्गज धराशायी हो गए। सिंधिया, दिग्विजय, तनखा, नटराजन जैसे जनाधार वाले नेता लाखों वोटों से पिछड़ गए। मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र ज़रूर कांग्रेस की इज़्ज़त बचाने में कामयाब हुए, लेकिन उनकी जीत पूरे प्रदेश में सबसे कम अंतर से हुई है। थोड़ी सी कमी छिंदवाड़ा में रह गई अन्यथा पूरे प्रदेश में कांग्रेस का सूपड़ा साफ था। ताई की जगह टिकट लेकर आए शंकर लालवानी इंदौर से रिकॉर्ड 5.5 लाख वोटों से चुनाव जीते।

जीतू पटवारी जैसे ज़मीनी नेता अपने बूथ से भी कांग्रेस को बढ़त नहीं दिला पाए। देशभर की बात करें तो सुप्रिया सुले, प्रिया दत्त, अशोक चव्हाण, मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद यादव, मीसा भारती, महबूबा मुफ्ती, वैभव गेहलोत जैसे नेताओं की लंबी सूची है, जिनका हारना अप्रत्याशित था। मोदी की महासुनामी में विपक्ष का सबकुछ लूट गया। मोदी की विकास योजनाओं, सर्जिकल स्ट्राइक से इतर कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण उनका अल्पसंख्यकों के प्रति लगाव रहा है। आम जनता कांग्रेस के तुष्टिकरण के मॉडल से इतनी ज्यादा घबराई हुई है कि कांग्रेस का सत्ता में आना उन्हें कतई गवारा नहीं है।

कांग्रेस की रैलियों में हरे झंडे लहराना, गोल टोपी लगाए कट्टरपंथियों का जमावड़ा जनता को रास नहीं आता है।  कांग्रेस की नीतियों को पसंद करने वाले भी इसलिए कांग्रेस को वोट नहीं कर पाते हैं चूंकि उन्हें तुष्टिकरण की राजनीति पसंद नहीं है। दशकों तक हिंदुओं का दमन और अल्पसंख्यकों को खुश करने वाली नीतियों का यह परिणाम है कि देश का बहुसंख्यक हिन्दू वोटर फूटी आंख भी कांग्रेस को सत्ता में नहीं देखना चाहता है।

वो वोटर साक्षी महाराज, साध्वी प्रज्ञा को भी चुनाव जितवा देता है, लेकिन कांग्रेस के मुस्लिम प्रेम से उसे सख्त नफरत है। दरअसल, साध्वी की जीत के पीछे भी जनता की इसी भावना ने काम किया है। कांग्रेस के मुस्लिमों के प्रति नरम नज़रिये को जवाब देने के लिए ही हिन्दू मतदाता मतदान करने लगे हैं। कांग्रेस के युवराज ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में मंदिर-मंदिर घूमकर कांग्रेस की छवि बदलने की कोशिश की थी।

कुछ हद तक वह कोशिश सफल भी हुई, लेकिन वायनाड के उनके जुलूस में लहराते मुस्लिम लीग के झंडों ने जनता को पुनः चौकन्ना कर दिया। सभी समझ गए कि यह हिंदुत्व का चोला सिर्फ ऊपरी आवरण है, इसके पीछे कांग्रेस की वही पुरानी तुष्टिकरण वाली सोच छिपी है। कांग्रेस के इस चेहरे से जनता को नफरत है। बाकी कसर मणिशंकर अय्यर जैसे नेता और कांग्रेस की कश्मीर से सेना हटाने वाले बयान पूरी कर देते हैं।

मोदी-शाह के साथ भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत काबिलेतारीफ है। हर बूथ पर भाजपा कार्यकर्ता 100% मतदान करवाने के लिए दौड़-धूप करते दिखाई दिए तो कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी संभावित हार देखकर पहले से ही निराश लग रहे थे। आज कमजोर नेतृत्व और गलत नीतियां कांग्रेस की सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गई हैं। कल प्रेस वार्ता में राहुल गांधी के हाव-भाव देखकर लगा नहीं कि वे नतीजों से आहत हैं। उनकी मुखमुद्रा सुख-दुख से परे दिखाई दे रही थी। ऐसी करारी हार के बाद भी कोई सबक कांग्रेस सीखना नहीं चाहती। मोदी-शाह युग भारत की राजनीति में लंबा चलने वाला है।

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