परिपाटी में बदलाव, राजनीतिक दांव…

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पुरानी फिल्में देखें तो उनमें हीरो अमिताभ, शशिकपूर आदि ‘बूट कट’ पेंट पहने नज़र आते थे। यह पेंट कमर से घुटने तक फिटिंग में होती थी, लेकिन नीचे पैरों के पास बहुत चौड़ी हो जाती थी, लेकिन जैसे कोई भी फैशन ट्रेंड ज्यादा दिन नहीं टिकता, वैसे ही यह ट्रेंड बदला और यह पेंट फैशन से बाहर हो गई, लेकिन पिछले दशक में यह ‘बूटकट’ फैशन एक बार फिर लौटकर आया और युवा कुछ सालों तक फिर इस पेंट के दीवाने हो गए। मेरे पास भी ऐसी एक बूटकट पेंट आज भी रखी है, जिसे आज के दौर में पहनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

ऐसे ही आजकल दाढ़ी रखने का भी ट्रेंड आजकल चल रहा है, जिस कारण हर युवा घनी दाढ़ी में नज़र आ रहा है। फैशन की तरह ऐसे ही ट्रेंड राजनीति में भी बदलते रहते हैं। इस बदलते ट्रेंड की आहट को महसूस करने के लिए राहुल गांधी और अखिलेश यादव के दो ताज़ा बयान सुनने की ज़रूरत है। राहुल गांधी कर्नाटक और गुजरात चुनाव में खुद को जनेऊधारी हिन्दू शिवभक्त बता रहे थे और मानसरोवर यात्रा की कामना भी उन्होंने प्रकट की।

इधर, अखिलेश यादव कह रहे हैं कि यदि वे उत्तरप्रदेश की सत्ता में वापस आए तो एक भव्य विष्णु मंदिर बनवाएंगे। हालांकि, सवाल दोनों युवा नेताओं से पूछे जाने चाहिए कि यदि राहुल सच में इतने बड़े जनेऊधारी हिन्दू हैं तो रामसेतु को तोड़ने वाली याचिका पर उनकी पार्टी ने लिखित हलफनामा देकर यह क्यों कहा था कि भगवान राम एक काल्पनिक पात्र हैं, जो कभी हुए ही नहीं, तब राहुल जी कहां थे? केरल में जब युवा कांग्रेसियों ने सरेआम सड़क पर गाय काटकर प्रदर्शन किया था तब भी राहुल गांधी क्यों चुप थे?

अखिलेश यादव को भी बताना चाहिए कि विष्णु मंदिर बनवाने के लिए उन्हें दोबारा सत्ता क्यों चाहिए? जब ये पांच साल मुख्यमंत्री रहे, तब भव्य मंदिर क्यों नहीं बनवा लिया और मुलायमसिंह यादव जब गर्व से कहते हैं कि हां, मैंने रामभक्त कारसेवकों पर गोलियां चलवाई, तब अखिलेश को क्या हो जाता है? समाजवादियों को आजकल विष्णु से प्रेम और उनके ही अवतार राम से नफरत क्यों? राहुल और अखिलेश दोनों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने को लेकर उनकी पार्टी का क्या मत है? यदि दोनों का हिन्दुप्रेम इतना उमड़ रहा है तो उन्हें खुलकर कहना चाहिए कि राम मंदिर वहीं बने, जहां रामलला विराजे हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं कहेंगे। वैसे आजकल बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी हिन्दुओं को रिझाने की कोशिश कर रही हैं तो महाराष्ट्र में शिवसेना भी इन्हीं कोशिशों में लगी है।

बात दरअसल यह है कि पिछले कुछ सालों तक देश में सिर्फ मुस्लिम वोटबैंक की ही चर्चा होती थी, उन्हीं का तुष्टिकरण किया जाता था, लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी की महाविजय ने साबित कर दिया कि हिन्दू भी एकमुश्त वोट करके प्रचंड बहुमत दिलवा सकते हैं। आहिस्ता करवट लेते इस ट्रेंड को पहचानने में विरोधियों से चूक हुई और जब तक उन्हें इसकी भनक लगी, तब तक भाजपा की सरकारें देश के आधे से अधिक हिस्से पर काबिज़ हो चुकी थी, लेकिन ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ की तर्ज़ पर अब विपक्ष भी मंदिर और हिन्दुओं की बातें करने लगा है।

जैसे फिल्मों में बूटकट पेंट का फैशन बदला, वैसे ही राजनीति में अब धर्मनिरपेक्षता का ट्रेंड बदल चुका है। आजकल ट्रेंड ‘हिन्दू अस्मिता’ का चल पड़ा है। कुछ राजनीतिक दल जहां बदलते ट्रेंड के साथ पार्टी की विचारधारा को बदलने में लगे हैं वहीं कुछ दल इस ट्रेंड में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं और उनका मुख्य अस्त्र एससी-एसटी एक्ट पर सवर्ण हिंदुओं को भड़काना बना है। इन सबके बीच देश की जनता यह सोचने लगी है कि ट्रेंड के बहाने ही सही, उनके आराध्य का मंदिर तो अयोध्या में बन जाए, जो कामना हर हिंदुस्तानी की है। क्योंकि ऐसे वक्त में जब हर पार्टी हिन्दू-हिन्दू करने में लगी है, तब भी यदि राम मंदिर नहीं बना तो फिर कब बनेगा ?

-सचिन पौराणिक

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