Talented View : रत्न की राजनीति

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महापुरुषों पर सियासत आज की राजनीति का लेटेस्ट ट्रेंड है। अब तक जिन महान नेताओं, क्रांतिकारियों को देश का माना जाता था, अब उन्हें भी ‘दल विशेष’ का माना जाने लगा है। नेहरू, इंदिरा कांग्रेस के तो सावरकर, बोस भाजपा के बन चुके है। गांधी और पटेल भी थे तो कांग्रेस के लेकिन अब भाजपा भी उन पर हक जताने लगी है। ताज़ा मामला सावरकर का चल पड़ा है क्योंकि महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव है।

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विनायक दामोदर सावरकर मातृभूमि के उन वीरों में एक है जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र पर निछावर कर दिया। अंग्रेज़ो ने हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के साथ सावरकर को भी ‘कालेपानी’ की सज़ा सुनाई थी। लेकिन एक खास विचारधारा के स्वतंत्रता सैनानियों को याद रखने और सम्मान दिलाने की साजिशों के चलते उन्हें वो सम्मान कभी नही मिल पाया जिसके वो हकदार थे। सावरकर को आज भी लौग अंग्रेज़ो का एजेंट, अंग्रेज़ो से माफी मांगने वाला, गांधी का हत्यारा तक कह जातें है।

हैरानी, दुख और गुस्से की मिश्रित भावना मन मे आती है जब कान में ऐसे शब्द सुनाई देतें है। मन करता है सावरकर को गाली देने वाले सभी लोगों को अंडमान स्थित सेल्युलर जैल जाकर दिखाऊँ की देखो ये कालकोठरी जिसमें सावरकर को रखा गया था। असंख्य जुल्म भारत के सपूतों पर अंग्रेजो द्वारा ‘कालापानी’ में किये गए। सावरकर अंग्रेज़ो के एजेंट होते तो उन्हें कभी कालेपानी की सज़ा नही मिलती बल्कि देश की जैलों में ससम्मान रखा जाता जैसे गाँधीजी को रखा जाता था। और ईसी मापदंड से देखे तो सवाल उठाया जा सकता है कि कहीं गाँधीजी ही तो अंग्रेज़ो के एजेंट नही थे?

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अंडमान के पोर्ट ब्लेयर में स्थिति सेल्युलर जैल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर रखा है। यहां रोज़ शाम होने वाले ‘लाइट एंड साउंड’ शो में दिखाया जाता है कि किस तरह जानवरो से भी बदतर सलूक आज़ादी के दीवानों के साथ किया जाता था। इस शो को देखते हुए ज्यादातर की आंखे भीग जाती है। और कोई भी ये जैल और शो देखने के सावरकर या किसी सैनानी के खिलाफ एक शब्द भी नही बोल सकता। लेकिन अज्ञान और सही जानकारी के अभाव या फिर राजनीतिक स्वार्थ के चलते हम अपने ही महान क्रांतिकारियों पर कीचड़ उछालने में लगें रहतें है।

वीर सावरकर को ‘भारत रत्न’ मिले चाहे न मिले लेकिन कम से कम उनके बारे में अपमानजनक बातें तो न कही जाए। सावरकर किसी पार्टी के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में नही कूदे थे। उनके लिए देश और देशवासी ही सबकुछ थे। उनके बारे में उलजुलूल कहने से किसे क्या हासिल होगा? अगर कोई पार्टी सावरकर को ‘भारत रत्न’ देने का वादा घोषणापत्र में करती है तो इसमें विरोध की क्या बात है? भारत का हर स्वतंत्रता सेनानी भारत रत्न का हकदार है, सावरकर के बहाने उन्हें याद रखा जाये तो इसमें क्या आपत्ति है?

राजनीति का इतना पतन हो चला है कि जनता के मुद्दों को उठाने को कोई पार्टी तैयार नही है। किसी को महापुरुषों के नाम पर राजनीति करना है तो किसी को देशभक्ति के नाम पर। इसके बाद भी मुद्दे कम पड़ते है तो ये किसी महापुरुष को चुनाव में घसीट लातें है और उनका राजनीतिकरण कर दिया जाता है। महापुरुषों पर राजनीति बंद होना चाहिए और स्वतंत्रता संग्राम के वीर सैनानियों का अपमान भी तत्काल बंद होना चाहिये। आज हम आज़ाद है तो इसकी बड़ी कीमत हमारे पूर्वजों ने चुकाई है। और कुछ नही तो कम से कम उन्हें सम्मान से याद करके हम उनकी कुर्बानियों की कद्र तो कर ही सकतें है।

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        – सचिन पौराणिक

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