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Talented View : हिंसक घटनाओं के लिए याद किया जाएगा बंगाल चुनाव

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क्षेत्रीय दलों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि इनका प्रभाव सीमित होता है। ये दल सिर्फ अपने राज्य तक ही अपनी पहचान बना पाते हैं। चाहे कितना ही पुराना क्षेत्रीय दल क्यों न हो, वो कभी राष्ट्रीय दल के समकक्ष नहीं हो सकता। राष्ट्रीय दल यदि किसी राज्य में हार भी जाता है तो बाकी देश में उनकी राजनीति चलती रहती है, लेकिन क्षेत्रीय दल को अपने राज्य में हार की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। सत्ता असल में एक चुम्बक की तरह कार्य करती है। सत्ता जब तक होती है, तब तक पार्टी, परिवार, कार्यकर्ता, नेता सभी में समन्वय बना रहता है।

सत्ता के जाते ही बिखराव शुरू हो जाता है। सत्ता जाते ही बिखराव का उदाहरण कांग्रेस और समाजवादी पार्टी है। 2014 की करारी हार के साथ ही कई बड़े नेता कांग्रेस का साथ छोड़ चुके हैं, लेकिन तब भी कांग्रेस को इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टी जैसे ही सत्ता से बाहर हुई पार्टी का विघटन शुरू हो गया। पार्टी, परिवार, कार्यकर्ता, नेता सभी अलग-अलग हो गए। आज अखिलेश यादव उसी बिखरे कुनबे को समेटने की असफल कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अखिलेश के आगे भी समस्याएं कम नहीं है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राजनीतिक रूप से काफी परिपक्व है और मोदी-शाह से उनकी दुश्मनी का आधार यही थ्योरी है।

ममता बनर्जी निस्संदेह एक बड़ी प्रभावशाली नेत्री है, लेकिन बंगाल के बाहर उनका कोई नामलेवा नहीं है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जड़ें गहरी होंगी तो ममता की जड़ें स्वाभाविक तौर पर कमज़ोर हो जाएंगी और जिस तरह से अमित शाह और कैलाश विजयवर्गीय बंगाल में काम कर रहे हैं इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा| यदि भाजपा बंगाल में आज तक की सर्वाधिक सीटें जीतकर आ जाए। ममता का गुस्सा, चिड़चिड़ापन, बौखलाहट सब इसलिए है कि बंगाल उनके हाथ से गया तो उनके हाथ में कुछ नहीं बचेगा।

बंगाल भाजपा के लिए सिर्फ एक राज्य है तो ममता बनर्जी के लिए जिंदगीभर की राजनीतिक उठापटक का फल। लेफ्ट के दशकों के शासन के बाद जिस मेहनत से ममता ने अपना राज्य कायम किया, वहां भाजपा का तेज़ी से पैर पसारना उन्हें बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। ममता मोदी-शाह को गुस्से से गुंडा कह रही है क्योंकि उनकी पार्टी के गुंडे उनका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं। यह बात सच है कि भाजपा ने बाहर से लड़के बुलवाकर बंगाल चुनाव में झोंक रखे हैं, लेकिन ऐसा न किया जाए तो बंगाल में टीएमसी के गुंडों से खुद की सुरक्षा करना भी सम्भव नहीं है।

बंगाल में लोकतंत्र के नाम पर गुंडागर्दी लेफ्ट के शासन में भी थी और वही हालात ममता के राज में भी है, लेकिन ममता की बौखलाहट की एक वजह यह भी है कि भाजपा ने इस चुनाव में सबसे ज्यादा ताकत बंगाल में ही लगा रखी है। भाजपा बंगाल में अपनी सीटें बढ़वाने के लिए जोर लगा रही है और यही बात ममता को हजम नहीं हो रही है। कहने को लेफ्ट और कांग्रेस भी चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उनका लड़ना, न लड़ना कोई मायने नहीं रखता है। बंगाल में इस बार सीधी टक्कर टीएमसी और भाजपा के बीच है। इस टक्कर में मर्यादा, नैतिकता, विनम्रता और शुचिता की कहीं कोई गुंजाइश नज़र नहीं आ रही है।

चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार 19 घंटे पहले ही इसीलिए बंद करवाया है क्योंकि उनसे भी बंगाल के हालात संभाले नहीं जा रहे हैं। बंगाल हिंसा की आग में जल रहा है, जनता का खून बहाया जा रहा है, हत्याएं हो रही हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं की जगह राजनीति में बची ही कहां है? हिंसा की घटनाओं को भी राजनीतिक नफे-नुकसान के पलड़े में तौला जा रहा है। बंगाल का चुनाव चाहे कोई भी जीते, लेकिन लोकतंत्र की हार बहुत पहले हो चुकी है। यह चुनाव हार-जीत के लिए नहीं बल्कि हिंसक घटनाओं के लिए याद किया जाएगा।

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