लोकतंत्र मजबूत करने में योगदान दें

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कल शाम 5 बजते ही महीनों से चल रहा चुनावी शोरगुल थम गया। पूरे प्रदेश में धारा 144 लगा दी गई है, शराब की दुकानें बंद करवा दी गई हैं और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगा दी गई है। यह सब इसलिए किया जाता है क्योंकि मतदाता को एक दिन शांति से यह सोचने के लिए मिल जाए कि आखिर वोट किसे देना है। ऊपर से यह चुनावी तस्वीर शांत दिखाई देती है, लेकिन अंदर ही अंदर असली खेल सक्रिय चुनाव प्रचार थमने के बाद ही शुरू होता है। धारा 144 लगी है, लेकिन नुक्कड़-चौराहों, पार्टी के दफ्तरों में हजारों की भीड़ है।

कार्यालयों में बीते कुछ दिनों से लंगर जैसे हालात बने हुए हैं। कार्यकर्ताओं के साथ आम जनता भी इस दावत का भरपूर लुत्फ उठा रही है। शराब के ठेके बंद हैं, लेकिन पार्टी के दफ्तरों में कार्यकर्ताओं के लिए बेहिसाब दारू उपलब्ध है। अगली दो रातों तक शहर की झुग्गी बस्तियों में यह शराब हर घर तक 500 के नोट के साथ पहुंचाई जाएगी। बदले में पार्टी को वोट देने का सौदा तय होगा। महिलाओं को रिझाने के लिए साड़ी के साथ एक कड़क पांच सौ का नोट भी साड़ी के ऊपर रखकर पन्नी में लपेटकर रख दिया गया है। साड़ी के अलावा पायल, कंबल और घड़ियां भी बांटी जा रही हैं।

इंदौर सहित कई शहरों से ऐसे वीडियो आने शुरू हो गए हैं, जिनमें प्रत्याशी खुद पांच सौ के नोट बांटते दिखाई दे रहे हैं। पैसे और शराब की नदियां खुलेआम बहाई जा रही है, लेकिन प्रशासन और चुनाव आयोग सड़कों पर आम जनता की गाड़ियां रुकवाकर चेकिंग में व्यस्त हैं। कोई अपने अस्पताल में भर्ती रिश्तेदार के लिए पैसे ले जा रहा है तो कोई छोटा व्यापारी सामान खरीदने जा रहा है, प्रशासन उन्हें रोककर उनकी नकदी जब्त कर रहा है। आम जनता को परेशान करके प्रशासन और चुनाव आयोग अपनी ही पीठ थपथपाकर खुश है।

हाईवे पर गाड़ियों की लंबी कतारें लगी हैं जबकि असली खेल पार्टी दफ़्तरों से निर्बाध रूप से चल रहा है। जहां से खुलेआम करोड़ों बांटे जा रहे हैं, वहां जाने की हिम्मत न प्रशासन कर पा रहा है न ही चुनाव आयोग। लोकतंत्र के पर्व पर सरेआम नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही है और कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। लोकतंत्र की असली विडम्बना भी यही है कि यहां 500 रुपए और एक पव्वे पर वोट देने वाले की कीमत भी एक पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी के वोट के बिलकुल बराबर है। संख्या के इस खेल में 10 बुद्धिजीवियों पर 15 अनपढ़ हमेशा भारी पड़ेंगे। कहते भी हैं कि लोकतंत्र में सिर्फ सिर गिने जाते हैं, सिर के अंदर क्या है, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। एक शेर 10 गीदड़ों पर सिर्फ कहानियों में भारी पड़ता है, लोकतंत्र में एक शेर का शिकार 10 गीदड़ बड़ी आसानी से कर सकते हैं।

अक्सर चर्चा में हम नेताओं को दोष देते हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि इन नेताओं को हमने ही चुना है। कोई नेता आसमान से नहीं टपकता बल्कि जनता के वोट से ही नेता बनता है। सारा कसूर सिर्फ अनपढ़ जनता का ही नहीं है, पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी भी उसे ही वोट करते हैं, जो उनके अहंकार को तृप्त करता है। यदि काबिल उम्मीदवार भी उनसे निजी तौर पर नहीं मिलता अथवा उन्हें उचित सम्मान नहीं देता तो वह भी अपना वोट व्यर्थ करने में एक पल की देर नहीं करते। प्रत्याशी की काबिलियत असल में वोट देने का हमारा कोई पैमाना ही नहीं है। कभी जाति, कभी मज़हब, कभी पार्टी तो कभी 500 रुपए, पायल तो कभी घड़ी के चक्कर में हम वोट डालते हैं और फिर बाद में पछताते हैं।

इसके अलावा इसे जनता का आत्मसम्मान कहिए, खुद्दारी कहिए, ज़मीर कहिए या बेवकूफी कहिए कि जो प्रत्याशी दारू-पैसे बांटता है, जनता उसी को वोट भी दे आती है। पैसे लेकर, दारू पीकर भी काबिल उम्मीद्वार को वोट दिया जा सकता है, लेकिन किसे समझाएं भला? कल ऐसा ही एक मौका एक बार फिर हमारे सामने है, जब हमें पांच साल के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनना है। यदि इस बार भी हम नाकाम हुए तो अगले पांच साल पछतावे के सिवाय कुछ हाथ नहीं आएगा। सतर्क रहें, होशियार रहे और समझ के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग करें और लोकतंत्र को मजबूत करने में अपना योगदान दें। लालच में आकर दिया गया आपका एक वोट आपके बच्चों का भविष्य खराब कर सकता है।

-सचिन पौराणिक

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