अमेरिका : युद्ध में कूदने को आतुर

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जापान पर परमाणु बम गिराने से लेकर हालिया ईरान मामले तक अमेरिका का इतिहास युध्द से भरा हुआ है। अपने आप को “अंतरराष्ट्रीय पुलिस” समझने की सनक में अमेरिका गाहे-बगाहे युद्ध में कूदने को आतुर रहता है। अफगानिस्तान, इराक, उत्तर कोरिया के बाद अब ईरान के साथ अमेरिका के हालात गर्मागर्मी के बन चुके है। अपना एक ‘ड्रोन’ गिराए जाने के बाद से अमेरिका ईरान को हमले की धमकी दिए जा रहा है। हमले का समय भी तय हो गया था, लेकिन ‘अज्ञात’  कारणों से ट्रंप ने हमला रद्द कर दिया।

सफलता के लिए छोटी-छोटी चीजों का ध्यान रखना ज़रूरी

जानकार बता रहे हैं कि ईरान से युद्ध की स्थिति अमेरिका के लिए ठीक नहीं है। चूंकि विश्व में अब सिर्फ अमेरिका ही एकमात्र महाशक्ति नहीं है। रूस, चीन और भारत भी तेज़ी से अपना प्रभुत्व जमाने लगे हैं। तेज़ी से बदल रहे अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को साधना युद्ध के दौर में अमेरिका के लिए मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा अमेरिका को ईरान से जंग में इज़राइल, सऊदी अरब, इंग्लैंड के अलावा कोई देश खुलकर साथ नहीं देने वाला। चूंकि ईरान एक बड़ा तेल उत्पादक देश है, चीन और भारत ईरान से सबसे ज्यादा तेल आयात करते हैं।

चीन के साथ अमेरिका का पहले से ‘ट्रेड वॉर’ चल रहा है| रूस ने भी अमेरिका को चेता दिया है कि ईरान पर हमला करने से हालात सुधरने वाले नहीं हैं और भारत भी ईरान से अपने पुराने संबंध खराब नहीं होने देना चाहता है। इसके अलावा अमेरिका की छवि ऐसे देश की बन चुकी है, जो ‘तेल’ के लिए ही युद्ध करता है। इराक के शासक सद्दाम हुसैन के पास कोई ‘रासायनिक हथियार’ नहीं बरामद हुए, लेकिन उसके बाद भी अमेरिका ने उसे मार दिया।

Talented View : न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम

‘आईसिस’ के खिलाफ छिड़ी जंग भी असल में तेल के ठिकानों को कब्जे में लेने की एक जद्दोजहद है। ईरान के साथ भी यही परिस्थिति है। दरअसल, कच्चे तेल की दुनिया में सबसे ज्यादा मांग है। इस मांग को पूरी करने के लिए ज्यादातर देश ‘खाड़ी देशों’ से होने वाले तेल आयात पर निर्भर रहते हैं। तेल बेचकर ये देश ‘मोटी कमाई’ करते हैं।

आने वाले समय में दुनिया में बादशाहत उसी देश की होगी, जिसके पास सबसे ज्यादा तेल भंडारों पर कब्ज़ा होगा। भविष्य की तेल खपत को देखते हुए सभी देशों की नज़र “मध्य-पूर्व” में लगी हुई है। मध्य-पूर्व के देशों में राजनीतिक अस्थिरता और युद्ध के हालातों की असली वजह भी तेल के विशाल भंडार ही है। आइसिस जैसे आतंकी संगठन भी तेल बेचकर ही हथियार खरीद रहे हैं और आतंक का राज स्थापित करने में लगे हैं। सऊदी एक सुन्नी मुसलमान बहुल देश है जबकि ईरान शिया बहुल। ‘शिया’ और ‘सुन्नी’ मुसलमान एक-दूसरे को जानी दुश्मन समझते हैं।

यही कारण है कि सऊदी और यूएई मुस्लिम देश भी इस जंग में अमेरिका के साथ है। भारत को इस जंग में संतुलन साधना होगा क्योंकि ईरान से हम तेल खरीदते हैं जबकि अमेरिका से हथियार। दोनों ही देश हमारे सहयोगी हैं इसलिए हमारे लिए यह परीक्षा की घड़ी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी सनक को लेकर मशहूर हैं। उनके शासन में अमेरिका अब तक किसी युद्ध तो नहीं कूदा, लेकिन अब ईरान से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। ईरान भी साफ कर चुका है कि अमेरिका ने हमला किया तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

Talented View : उन्हें परेशान करने का भी उन्हें कोई हक़ नहीं बनता

ऐसे हालात में ट्रम्प की छोटी सी गलती दुनिया को फिर से युद्ध में झोंक सकती है। दुनिया का कोई देश इस युद्ध से अछूता नहीं रह सकता क्योंकि सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे इस ‘तेल के खेल’ को पूरी दुनिया टकटकी लगाए देख रही है। विश्व शांति को बनाए रखने के लिए अमेरिका को अपनी बढ़ती हुई ‘तेल की भूख’ पर लगाम लगाने की सख्त ज़रूरत है।

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