Talented View : देश में बद से बदतर होते हालात चिंताजनक

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पिछले 2-3 दिन में घटी दो घटनाओं को लेकर मन अत्यधिक व्याकुल है। पहली दिल्ली में गोल टोपी पहनी भीड़ द्वारा बसों पर पत्थर बरसाने की और दूसरी अलीगढ़ में 3 साल की मासूम ट्विंकल के साथ हुई बर्बरता। ये दोनों घटनाएं ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि हमारी कानून व्यवस्था कितनी ‘पंगु’ हो चुकी है। पत्थर फेंकने वाली गैंग कश्मीर से दिल्ली तक आ पहुंची है, तो मासूम बच्चियों के साथ घिनौनी हरकतें करने वाले भी देश के कोने-कोने में पहुंच चुके हैं। बीते साल कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़ियों ने कुछ गाड़ियों के शीशे फोड़ दिए थे।

इस उत्पात को ‘भगवा’ रंग से जोड़ दिया था और बाकायदा 100 अफसरों की टीम बनाकर एक-एक कांवड़िए को पकड़ा गया था, लेकिन जब दिल्ली में बसों पर पत्थर फेंके जा रहे थे, तो पुलिस किंकर्तव्यविमूढ़ होकर तमाशा देख रही थी। एक गाड़ी अगर तेज़ गति से वहां से लापरवाही पूर्वक गुजर गई तो इसमें वहां खड़ी बाकी गाड़ियों का क्या कसूर?  सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर ये कौन सी बहादुरी दिखाई जा रही थी? डीटीसी की बसों पर ऐसे ताबड़तोड़ पत्थर बरसाए गए मानो ये बस नहीं हज वाला शैतान हो।

दूसरी घटना अलीगढ़ की है जहां एक बच्ची से हैवानीयत की हदें पार कर दी गयी। यहां उधारी के पैसे न चुका पाने पर जाहिद और असलम ने एक 3 साल की मासूम का ही शिकार कर डाला। बच्ची के साथ जो बर्बरता की गई वो लिखने में कलम भी कांप उठेगी। योगी बाबा की सरकार में ऐसे अपराध हो रहे हैं कि हालात ‘बच्चों से गलतियां हो जाती हैं’ वाली सरकार से भी बदतर हो चुके हैं। लगता है देश के गृहमंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के ‘दिल जीतने’ वाले बयान से ज्यादा ही उत्साहित हो गए हैं, क्योंकि सरकार बजाय इन उपद्रवियों पर सख्त कार्रवाई करने के इनका ‘दिल जीतने’ में लगी हुई है।

साहब के दिल जीतने वाले बयान का ऐसा असर हुआ कि साध्वी प्रज्ञा भी ईद की बधाई देने शहर क़ाज़ी के यहां पहुंच गई| आमतौर पर सरकारों का ‘हनीमून पीरियड’ 6 महीने या एक साल में ही खत्म हो जाता है, लेकिन इस सरकार के 5 साल गुज़र जाने के बाद, नई पारी की शुरुआत के बाद भी अभी हनीमून पीरियड ही चले जा रहा है। समझ नहीं आता कि 56 इंच का सीना ऐसे मामलों पर इतना लाचार क्यों हो जाता है?

अमित शाह जैसा गृहमंत्री होने के बाद भी क्या यही दिन देखने बाकी हैं? इतिहास गवाह है कि भाजपा को वोट कभी विकास के नाम पर नहीं मिलते। इन्हें जनता चुनती है भावनात्मक मुद्दों पर, बहुसंख्यक मामलों पर, लेकिन ये लोग सत्ता में आने पर एक ठोस काम अपने वोटर के हित में नहीं कर पाते।

देश की राजधानी में हो रही पत्थरबाज़ी पर ये लोग अंकुश नहीं लगा पा रहे तो इनसे आखिर कैसे उम्मीद करें कि ये कश्मीरी पत्थरबाज़ों से निपट सकेंगे? ढाई साल की मासूम की ये सुरक्षा नहीं कर पा रहे और वादे देश की सीमाओं को सुरक्षित करने के कर रहे हैं? आजकल ये लोग बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी को ‘जयश्रीराम’ लिखे पोस्टकार्ड पहुंचाने में लगे हुए हैं, लेकिन असल में इन्हें देश की महिलाओं द्वारा चूड़ियां पहुंचाने की जरूरत है।

56 इंच के राज में ऐसी अराजकता आम दिनों में फैल रही है| कैसे ये धारा 370 हटा पाएंगे? जो सरकार मुट्ठीभर टोपी वालों को नही संभाल पा रही, क्या वह राममन्दिर जैसा बड़ा कदम उठा पाएगी?

सरकार को एक बार खुद के गिरेबां में झांककर ये सवाल खुद से पूछना चाहिए कि क्या ऐसी अराजकता फैलाने वालों पर आंखे बंद करके इनका दिल जीतने का ख्वाब है आपका? अगर हां… तो ये ख्वाब देश के लिए बहुत डरावना होगा।

कश्मीर को लेकर अमित शाह की सोच…?

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