Talented View : इन अधिकारियों पर लगाम लगानी ही पड़ेगी

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कुछ सरकारी विभाग ऐसे हैं, जिनके काम करने का ढर्रा जनता को परेशान करने का बन गया है। मामूली काम के लिए भी यहां जनता को धक्के ही खाने पड़ते हैं। यहां भ्रष्टाचार काम शीघ्रता से करवाने का एकमात्र उपाय है। इन महकमों के कर्मचारी इतनी फुर्सत में होते हैं कि ठंड के दिनों में 12 बजे तक ये सिर्फ धूप सेंकने का कार्य करते हैं। इन सरकारी बाबुओं, अफसरों पर लिखना शुरू करेंगे तो शब्द कम पड़ जाएंगे। कुल मिलाकर बात का सारांश यह है कि नगर निगम जैसे महकमों में काम करने वाले 90% कर्मचारी भ्रष्ट हैं और गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं।

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कोई नगर निगम किसी काम के सिलसिले पहुंचता है तो इन कर्मचारियों का व्यवहार देखकर एक बार वह इनकी पिटाई करने की ज़रूर सोचता है, लेकिन आम आदमी की अपनी मजबूरी होती है। वह अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए व्यर्थ के पचड़ों में पड़ने के बजाय अपना काम निकलवाने पर ही ध्यान देता है। आखिर में ले-देकर वह अपना काम निकलवाता है और ऐसा महसूस करता है मानो गंगा-स्नान कर लिया हो। आदमी यह सोचकर नगर-निगम से निकलता है कि भगवान न करे कि कभी दोबारा यहां आने का काम भी पड़े| कई नेता, जिनके पास ताकत होती है, वे इन अधिकारी/ कर्मचारियों के साथ वह कर देते हैं, जो आम आदमी सिर्फ सोचता ही रह जाता है।

इंदौर के आकाश विजयवर्गीय हो या मुम्बई के नितेश राणे, ये नेता इन अफसरों को तुरन्त ठीक कर देते हैं। इंदौर में आकाश बल्ला लेकर तो मुम्बई में नितेश कीचड़ से नहलाकर इन अफसरों को समझाने का प्रयास करते हैं किन्तु आजकल ऐसी घटनाओं के वीडियो तेज़ी से वायरल हो जाते हैं, जिससे युवा नेता ‘बैकफुट’ पर आने को मजबूर हो जाते हैं। जो भी शख्स कभी किसी काम से नगर-निगम गया है, वह इन वीडियो को देखकर आकाश-नितेश को दुआएं ही दे रहा होगा।  नैतिक रूप से अगर देखा जाए तो उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए, लेकिन नैतिक रूप से नगर-निगम के कर्मचारी-अधिकारियों को भ्रष्टाचार भी तो नहीं करना चाहिये।

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क्यों ये लोग कोई काम बिना पैसे लिए नहीं करते हैं? क्यों ये लोग हर ठेके में भ्रष्टाचार करते हैं ? अगर इन्हें ईमानदारी, नैतिकता की फिक्र नहीं है तो इनके साथ नैतिकता की बात करना ही बेमानी है। इन्हें उसी भाषा मे समझाया जा सकता है, जो भाषा इन्हें समझ में आती है। रिश्वत के पैसे खा-खाकर निगम के कर्मचारियों की चमड़ी इतनी मोटी हो जाती है कि ये लोग किसी को कुछ नहीं समझते।  हम लोग खुद भी इतने ‘ढोंगी’  हैं कि “गब्बर” फ़िल्म देखकर उसकी तारीफ करेंगे, सबसे कहेंगे कि भ्रष्टाचारियों के साथ यही होना चाहिये, लेकिन अगर कोई किसी अधिकारी पर बल्ला उठा ले तो हमें नैतिकता, शुचिता जैसे सब पाखंड याद आ जाते हैं।

आकाश, नितेश यदि ग़लत हैं तो निगम के कर्मचारी भी कहां सही है?  इन लोगों ने भ्रष्टाचार की सारी हदें लांघ दी हैं। आम जनता भी उनसे त्रस्त हो चुकी है। एक बार सरकारी नौकरी लगने के बाद कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता जैसी मानसिकता के कारण ये अपने आप को भगवान समझने लग जाते हैं। जनप्रतिनिधियों को हर पांच साल में फिर जनता के बीच जाना होता है इसलिए उन्हें तो जनता की फिक्र करना ही पड़ती है, लेकिन जब ये अधिकारी उनकी भी नहीं सुनते हैं तो फिर ‘बाहुबल’ दिखाना ही पड़ता है।

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माना कि ये एक तरह की गुंडागर्दी है, लेकिन साहब ‘विनम्रता’ से बात बन भी तो नहीं रही है। यदि इन्हें न पीटा जाए तो फिर किस तरीके से समझाया जाए? ऐसा कानून बनना चाहिए कि हर सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार में लिप्त होने पर तुरन्त नौकरी से बर्खास्त किया जाए, तब हालात सुधरेंगे। तब तक के लिए आकाश-नितेश जैसे विधायकों को ही इन अधिकारियों पर लगाम लगानी पड़ेगी।

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