Talented View : ऐसे ‘बल्लेबाज़’ नेता लोकतंत्र के लिए खतरा

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हमारे शहर में युवा मोर्चा के एक नेता हुआ करते थे। वैसे तो उनके तमाम गैर-कानूनी गोरखधंधे चलते थे, कमाई भी बहुत थी लेकिन “भोकाल” दिखाने के लिए उन्होंने नेतागिरी भी शुरू कर दी। एक स्कॉर्पियो में नेताजी चलने लगे और कुछ बेरोज़गार किस्म के लड़के हमेशा उन्हें घेरे रहते। नेतागिरी चमकाने के बाद पहला सिद्धांत पुलिस पर दबाव बनाने का होता है। सो नेताजी ने भी पुलिस थाने में ‘बंदी’ पहुंचानी शुरू की।

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इसके एवज में नेताजी के एक फ़ोन मात्र से पुलिस उनके लड़कों की गाड़ी छोड़ने से लेकर हर गुंडागर्दी पर पर्दा डालने लगी, लेकिन एक बार किसी प्रकरण में ऊपर से दबाव आया और पुलिस को नेताजी के एक लड़के पर कार्रवाई करना पड़ गई। इससे नाराज़ और गुस्से से तमतमाए नेताजी ने पुलिस वालों को खूब खरी-खोटी सुनाई। नेताजी ने तमाम विशेषणों का प्रयोग करते हुए पुलिस वालों को उनकी ‘औकात’ विस्तार से समझाई। पुलिस वाले भी चूंकि उनकी ‘बंदी’ लेकर मस्त हो रहे थे इसलिए उन्होंने चुपचाप नेताजी की गालियों को सुना।

यह प्रकरण उस समय अचानक दिमाग मे कौंध गया, जब कैलाश विजयवर्गीय एक पत्रकार को उसकी औकात समझा रहे थे। विजयवर्गीय मीडिया को खुलकर ‘हड़का’ रहे हैं, उसके बाद भी मीडिया उनके खिलाफ लामबंद नहीं हुआ है। इसका मतलब यही है कि मीडिया वाले भी कहीं न कहीं इन जैसे नेताओं, पार्टियों से ‘बंदी’ लेते हैं, जिसका कर्ज़ उन्हें चुकाना ही पड़ता है। विजयवर्गीय के ‘बैटमैन’ सुपुत्र पर सवाल पूछने पर पत्रकारों को ही उनकी “औकात” दिखाई जा रही है। क्या यही है भाजपा के ज़मीनी नेताओं का चरित्र?  कैलाशजी को एक प्रश्न खुद से पूछना चाहिए कि यदि आकाश उनका पुत्र न होता तो उसकी विधायक बनने की औकात थी क्या?

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आकाश इतने नादान हैं कि निगम अधिकारियों पर बल्ला चलाने से पहले उन्होंने यह तक नहीं सोचा कि इंदौर की महापौर भाजपा की ही है। इसके अलावा जर्जर मकानों को यदि नगर निगम ने खाली नहीं करवाया और कल को कोई हादसा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी क्या आकाश लेंगे?  वैसे आकाश राजनीति में कुछ खास कमाल दिखा नहीं पा रहे हैं इसलिए यह तय है कि महज़ कुछ हजार वोटों से जीतकर विधायक बनने वाले आकाश अपनी ऐसी हरकतों के साथ राजनीति के आकाश तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे, लेकिन मीडिया वालों के लिए ये घड़ी आत्ममंथन की ज़रूर है। उन्हें यह निर्णय लेना ही पड़ेगा कि उन्हें भी पुलिस की तरह ‘बंदी’ लेकर नेताओं की गालियां खाना है या आत्मसम्मान के साथ सीना तानकर सवाल पूछने हैं?

दूसरा विकल्प तभी खुलेगा, जब पत्रकार बिरादरी खबरों के प्रति ‘चयनात्मक’ रवैया अपनाना बंद करेगी और नेताओं की ‘बंदी’ लेने से भी इनकार कर देगी, लेकिन जब तक मीडिया पार्टी विशेष की पिट्ठू बनकर कार्य करेगी, वक्त-बेवक्त उन्हें इस तरह नेताओं के हाथों बेइज्जत होना ही पड़ेगा। आज में ज़माने में नेतापुत्रों के पास न पैसे की कमी है, न शोहरत की और न ही उनके मन में जनता के लिये कोई सेवा भावना है। वे भी सिर्फ ‘भोकाल’ दिखाने के लिए ही नेतागिरी कर रहे हैं।

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पुलिस और मीडिया को भी ये इसी काम में इस्तेमाल कर रहे । जब चीजें इनके हिसाब से नहीं होती, तब दरअसल ये नेता अपनी असली औकात में आ जाते हैं। फिर इनके हाथ में बल्ला आ जाए चाहे तलवार वही लेकर ये अपना बदला लेने निकल पड़ते हैं। ऐसे ‘बल्लेबाज़’ नेता न सिर्फ समाज के लिए बल्कि लोकतंत्र के लिए भी एक खतरा है।

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