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Talented View : नेताओं का पक्का इलाज़ सिर्फ जनता के पास

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कल सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर लिखा, “मुलायम भाई, आप पितामह हैं समाजवादी पार्टी के। आपके सामने रामपुर में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा है। आप भीष्म की तरह मौन साधने की गलती मत करिए।” यह बात सुषमा ने इसलिए लिखी क्योंकि मुलायम की पार्टी के आज़म खान ने रामपुर से भाजपा प्रत्याशी जयाप्रदा के बारे में अशोभनीय टिप्पणी की थी, लेकिन सुषमा स्वराज शायद यह भूल गई कि लड़कियों से रेप के मामले में इन्हीं मुलायम ने कहा था कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। इन्हीं मुलायम के सुपुत्र अखिलेश से एक महिला पत्रकार ने राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर प्रश्न पूछा था तो अखिलेश ने बेशर्मी से जवाब दिया था कि आपके साथ तो कुछ नहीं हुआ न, फिर आप क्यों परेशान हो रही हैं?

Talented View : जनता है कि समझने को तैयार ही नहीं है

ऐसे हालातों में सवाल ही नहीं है कि मुलायम आज़म खान पर कोई कार्रवाई करें क्योंकि कार्रवाई का सवाल तब पैदा होता है, जब उन्हें लगेगा कि आजम ने कुछ गलत किया। यहां तो पूरा तालाब ही गंदा है तो सिर्फ एक मछली पर कार्रवाई की बात ही बेमानी है। मुलायम या अखिलेश की भी छोड़िये, देश का चुनाव आयोग भी इतना ढुलमुल है कि ऐसे बयानवीरों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती। आज़म खान हो, योगी आदित्यनाथ हो, मायावती हो या फिर मेनका गांधी, किसी नेता पर ठोस कार्रवाई चुनाव आयोग नहीं कर पाता। चुनाव के दौर में नेताओं का असली चरित्र जनता के सामने खुलकर सामने आ रहा है। ओवैसी बंधु आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, बहनजी खुलकर मुसलमानों से वोट मांग रही हैं, आज़म खान महिलाओं का अपमान कर रहे हैं और बाकी नेता भी इनकी ही राह पर चल रहे हैं। बदज़ुबानी और बदतमीजी बढ़ती जा रही है, लेकिन चुनाव आयोग कुछ नेताओं पर 48 घंटे और 72 घंटे का प्रतिबंध लगाकर ही अपनी पीठ थपथपा रहा है। इस प्रतिबंध को भी नेता धता बता रहे हैं। हिमाचल के भाजपा अध्यक्ष ने इन सबसे एक कदम आगे आकर मंच से ही भद्दी गालियां देना शुरू कर दी।

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आश्चर्य इस बात का है कि उनका बयान मीडिया से भी गायब है। सवाल है कि नेताओं के आगे चुनाव आयोग इतना लाचार क्यों है? स्वतंत्र संस्था होने के बाद भी चुनाव आयोग इतना बेबस क्यों नज़र आता है? नेताओं की अभद्रता बढ़ती जा रही है और चुनाव आयोग ठोस कार्रवाई की जगह 2-3 दिन का प्रतिबंध लगाकर अपने कर्तव्यों की ‘इतिश्री’ क्यों समझ रहा है? इन प्रश्नों का जवाब छुपा है चुनाव आयोग की बनावट में। जिले में चुनावी आचार संहिता लागू करवाने की जिम्मेदारी कलेक्टर पर होती है। कलेक्टर भी जानते हैं कि चुनाव खत्म होने कर बाद ये नेता उनका ट्रांसफर भी करवा सकते हैं और उनकी पोस्टिंग भी बदलवा सकते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग के अधिकारियों की स्थिति “पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करना” वाली हो जाती है।

कुछ ईमानदार अधिकारियों की छोड़कर बाकी सभी जिलाधिकारी नेताओं पर नाममात्र की कार्रवाई करते हैं। ऐसी कोई लोकसभा सीट नहीं है देश में, जहां चुनाव आयोग द्वारा तय खर्च सीमा में कोई दावेदार चुनाव जीतकर बता दे। ऐसे में आयोग का काम सिर्फ नोटिस भेजना, जवाब तलब करना और उस जवाब से संतुष्ट हो जाना ही रह जाता है। ज्यादा हंगामा मचे तो 2 या 3 दिन चुनाव प्रचार करने पर रोक लगा दी जाती है, लेकिन इससे नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता। नेता फिर वही बातें करेंगे और आयोग अपनी बेचारगी पर आंसू बहाएगा।

गालीबाज और बदतमीज़ नेताओं का असली इलाज़ सिर्फ जनता कर सकती है, लेकिन जनता भी ऐसी भाषा इस्तेमाल करने वाले नेताओं को जिताकर संसद भेज देती है। ऐसे में इन्हें और शह मिलती है। आज़म खान जब जयाप्रदा के बारे में अपशब्द बोल रहे थे, तब वहां मौजूद जनता तालियां बजा रही थी। ऐसे में नेता भी बेलगाम हो जाते हैं। यदि जनता खुद ही ऐसे नेताओं का विरोध करना शुरू कर देगी तो ये तस्वीर बदली जा सकती है। अकेले चुनाव आयोग के बस में है ही नहीं कि नेताओं का कुछ पक्का इलाज़ कर पाए। ऐसे नेताओं का पक्का इलाज़ सिर्फ जनता के पास है।

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