गोभक्तों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही

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कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जिले के कुछ कार्यक्रमों में शिरकत करने रतलाम आए हुए थे। मुख्यमंत्री को जिस रास्ते से शहर में दाखिल होना था वहां सड़क के दोनों तरफ कूड़े के बड़े-बड़े ढेर लगे थे। प्रशासनिक अफसरों को कूड़े के ढेर हटवाने में कई दिन लग जाते इसलिए उन्होंने ‘शॉर्टकर्ट’ या कहें कि ‘जुगाड़’ लगाते हुए सड़क के दोनों तरफ कनातें (टेंट) लगवा दीं। मुख्यमंत्री रात को उसी रास्ते से शहर में दाखिल हुए, लेकिन गंदगी टेंट से पहले ही छिपा दी गई थी। ऐसे जुगाड़ तकरीबन हर जगह पर प्रशासन हमेशा अपनी खामियों को छिपाने के लिए करता रहता है, लेकिन राजगढ़ प्रशासन ने जुगाड़ की सारी हदें ही पार कर दीं।

राजगढ़ जिले की जीरापुर तहसील की ये खबर है, जहां प्रधानमंत्री की “स्वच्छता ही सेवा अभियान” के एक आयोजन में प्रशासन द्वारा वाहवाही लूटने के लिए गौशाला की गायों को बाहर निकाला गया, जिनमें से लगभग 8 गायों की मौत हो गई है। इस कार्यक्रम के लिए गौशाला से बीमार और कमजोर गायों को छांटकर मंडी प्रांगण में बंद कर दिया गया और किसानों से स्वस्थ गायों को उधार लेकर कारपेट पर बैठा दिया गया। अफसरों के इस जुगाड़ का किसी को पता भी नहीं चलता, यदि मंडी प्रांगण में बंद गायों की मौत नहीं हुई होती। कहा तो यह भी जा रहा है कि गायों की मौत भूख की वजह से हुई है क्योंकि मंडी में गायों के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी जबकि उधार ली हुई तंदुरुस्त गायों की खातिरदारी के लिए चारे-पानी की बाकायदा व्यवस्था की गई थी।

अफसरों का गड़बड़झाला यहां भी खत्म नहीं हुआ बल्कि उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंस में भी प्रधानमंत्री से सरपंच की जगह उसके पति से बात करवा दी। हालांकि उन्हें क्या बोलना है, इसकी स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी। उन्हें यही बोलना था कि “चार साल पहले गांव में गंदगी बिखरी रहती थी, चारों तरफ कचरे के ढेर लगे रहते थे, लेकिन अब गोशाला में गोबर गैस प्लांट लगने से गांव की तस्वीर बदलने लगी है।”  खैर, विभिन्न सरकारी योजनाओं के हितग्राहियों से प्रधानमंत्री की चर्चा में पहले से रटी-रटाई बातें बोलना एक अलग विषय है, लेकिन इन गायों की मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है? यदि गोशाला में गायें बीमार और कमजोर हैं तो उनका इलाज होना चाहिए या उन्हें मरने के लिए छोड़ देना चाहिए?

गो तस्करों को पकड़कर मारने वाले गोरक्षक अब कहां छिप गए हैं? प्रशासन के आदेश पर गायों के साथ क्रूरता की जा रही है और सरकार अपनी योजनाओं के फर्जी गुणगान से ही खुश नज़र आ रही है? “गाय, गंगा और गीता” के देश में गौ के साथ सरकारी अमले द्वारा यह सलूक किया जा रहा है और कोई इस मुद्दे पर बोलने को भी तैयार नहीं है?

शुक्र है कि यह कार्यक्रम वीडियो कांफ्रेंसिंग से होना था| यदि प्रधानमंत्री खुद आते तब तो इन गायों का क्या होता अंदाज़ लगाया जा सकता है। सवाल है कि प्रशासन अपनी वाहवाही करवाने के लिए इतना संवेदनहीन क्यों हो जाता है? समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए जुगाड़ लगाना गलत नहीं, लेकिन अपने निजी स्वार्थ के लिए गायों की जान ले लेना भी कहां उचित है? आखिर बीमार और कमजोर गायों का कसूर क्या था, जो उन्हें बेरहमी से मरने के लिए छोड़ दिया गया? यह घटनाक्रम उस प्रदेश में हुआ है, जहां गौहत्या प्रतिबंधित है| मुख्यमंत्री खुद को गोभक्त कहते हैं, गोसंवर्धन की जहां सरकारी योजनाएं चलती हैं और प्रधानमंत्री खुद भी गोभक्त हैं। गोभक्तों के चारों तरफ सत्ता में रहते गायों का यह हाल है तो गौ के लिए धरातल पर कितना कुछ किए जाने की ज़रूरत है, समझा जा सकता है।

इस घटना से प्रशासनिक अमले की मंशा पर भी सवाल उठते हैं क्योंकि उन्हें सिर्फ कार्यक्रम की सफलता और अपनी वाहवाही की फिक्र है बाकी आम जनता हो या गोवंश किसी की परेशानियों से उन्हें कोई सरोकार नहीं रहता है। अपने आकाओं को खुश करने के चक्कर में प्रशासन को अपना असली काम नहीं भूलना चाहिए। जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अफसरों और इस सरकारी संवेदनाशून्य सरकारी तंत्र के कारण 8 गायें बेमौत मारी गई हैं, लेकिन गोभक्त सरकार और गोभक्त समाजसेवकों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। संवेदनहीनता की इससे ज्यादा पराकाष्ठा क्या होगी?

-सचिन पौराणिक

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