Talented View: मौलानाओं का नारी सम्मान ?

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शशि थरूर के ‘हिन्दू पाकिस्तान’, राहुल गांधी के ‘कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है’ और कुमारस्वामी के ‘शिव की तरह विषपान’ जैसे बयानों के बीच तीन तलाक और हलाला के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली मुस्लिम महिला निदा खान के खिलाफ बरेली के एक मौलवी ने फतवा जारी करके उन्हें कौम से बाहर कर दिया। राहुल गांधी महिलाओं को आरक्षण के बिल पर सरकार को समर्थन का ऐलान कर चुके हैं, लेकिन तीन तलाक पीड़ित निदा खान जैसी हज़ारों महिलाओं के समर्थन में उनके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल रहा है क्योंकि मुस्लिमों की पार्टी होने के शायद यही मायने हैं कि मुस्लिम महिलाओं को उनके मौलिक अधिकार देने की बात पर अपनी जुबां पर ताले लगा दिए जाएं।

खैर, राहुलजी के इस दोहरे रवैये पर फिर कभी बात करेंगे, लेकिन कल एक समाचार चैनल पर बहस के दौरान ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रवक्ता ने खुद को आईना दिखाए जाने पर एक मुस्लिम स्कॉलर को सरेआम औकात में रहने और अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली। सैयद असीम वकार ने मुस्लिम विद्वान डॉ.रिज़वान अहमद को जब ये अपशब्द बोलने शुरू किए, तब उनकी आवाज़ बंद कर दी गई, लेकिन उन्होंने धमकी देना जारी रखा। इसके अलावा कल ही एक अन्य समाचार चैनल पर एक मौलाना कासमी और मुस्लिम समाज की ही एक महिला के बीच हाथापाई हो गई। साथ बैठे अन्य प्रवक्ताओं ने बीच-बचाव करके मामला ठंडा किया।

सोचने वाली बात यह है कि जो मौलाना एक महिला पर सार्वजनिक स्थल पर कैमरों के सामने लाइव हाथ उठा सकता है, वह बंद कमरों में महिलाओं के साथ क्या करते होंगे? किसी की बात से असहमत होने का क्या यही मतलब है कि आप हाथापाई पर उतर आएंगे? दुनिया का आखिर कौन सा मज़हब नारी पर हाथ उठाने को कहता है? ये मौलाना जो खुद अपने व्यवहार पर संयम नहीं रख पा रहे हैं, वे अपने अनुयायियों के क्या सीख देते होंगे? एक महिला, जो तीन तलाक और हलाला जैसी सामाजिक बुराइयों से लड़ रही है, उसके खिलाफ फतवे निकाले जा रहे हैं और टीवी बहस में महिला का पक्ष ले रही महिलाओं के साथ हाथापाई की जा रही है। क्या यही है मौलानाओं का नारी सम्मान?

इन सबके बीच सवाल यह भी है कि भारत में यदि मुस्लिम सच में ही इतने डरे हुए हैं तो टीवी बहस में दूसरे प्रवक्ताओं को धमकियां कौन दे रहा है? भारतीय न्याय प्रणाली के समानांतर हर जिले में शरिया अदालतें खोलने पर कौन आमादा है? अपनी ही बिरादरी की महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों को प्राप्त करने से रोकने के लिए कौन फतवे निकाल रहा है? अपनी कौम के लिए एक अलग मुल्क कौन मांग रहा है? मजहब के नाम पर युवाओं को आतंक की राह पर कौन धकेल रहा है?

सवाल है कि मौलाना कासमी जैसे मज़हब के ठेकेदारों को शर्म नही आई एक महिला पर हाथ उठाते हुए? ये मौलाना है या शैतान? ऐसी हरकतों से नहीं आता मज़हब खतरे में? ऐसे बदतमीज़ मौलाना पर फतवा क्यों नहीं जारी होता? फतवा क्या सिर्फ सच्चाई के लिए लड़ने वालों के खिलाफ ही जारी होता है क्या? यदि निदा खान को मज़हब से निकाला जा सकता है तो मौलाना कासमी को क्यों नहीं? एक वरिष्ठ मुस्लिम महिला वकील पर टीवी स्टूडियो में इस तरह बेशर्मी से हमला किया जा सकता है तो आम मुस्लिम महिला पर घर की चारदीवारी के भीतर किस तरह के जुल्म किए जाते होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है।

इसमें कोई शक नहीं कि न्यूज़ एंकर जानबूझकर भड़काने वाली बहस करवाते हैं, जिससे उनके चैनल और शो की टीआरपी बढ़े, लेकिन जब दूसरों को मज़हबी तालीम देने वाले मौलाना खुद ऐसी बचकानी हरकतें करेंगे तो कौम को क्या संदेश जाएगा? ऐसे वक्त में जब केंद्र सरकार तीन तलाक और  हलाला से पीड़ित मुस्लिम बहनों को न्याय दिलाने के लिए कानून बनाने जा रही है, तब टीवी चैनलों पर मौलानाओं का इस तरह गुस्सा निकालना दुनिया को यही संदेश देगा कि भारत के मुस्लिम अपने मज़हब की महिलाओं को उनके मौलिक अधिकार भी नहीं देना चाहते हैं।

-सचिन पौराणिक

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