कांवड़ यात्रा को बदनाम करने की साजिश

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बात यूपीए के कार्यकाल की है, जब पाकिस्तानी सेना ने संघर्ष विराम को एक बार फिर धता बताते हुए भारतीय चौकियों को निशाना बनाया था। तब केंद्रीय मंत्री पी.चिदम्बरम ने संसद में इस मामले में सफाई देते वक्त कहा था कि आतंकवादियों ने पाक सेना की वर्दी में भारतीय सेना पर हमला किया। चिदम्बरम के इस बयान की काफी आलोचना हुई क्योंकि उनका यह बयान पाकिस्तान के प्रवक्ता की तरह नज़र आया। सवाल उठे कि बिना जांच के चिदम्बरम को कैसे पता चल गया कि यह हमला पाक सेना ने नहीं बल्कि आतंकवादियों ने किया था?

अभी कांवड़ यात्रा चल रही है और कांवड़िए श्रद्धा के साथ भोले की भक्ति में लीन होकर अपनी भक्ति में लगे हैं। सावन के महीने को भगवान शिव की आराधना का पर्व माना जाता है और इस महीने देश के विभिन्न भागों में कांवड़ यात्रा निकाली जाती है। इस यात्रा में पवित्र नदियों का जल कांवड़ में भरकर श्रद्धालु पैदल शिव के आराधना स्थल तक पूरी पवित्रता के साथ ले जाते हैं और उस जल से भगवान का अभिषेक करते हैं। इस यात्रा के दौरान यात्रियों को इस जल से भरे कांवड़ की भी सुरक्षा करनी होती है।

उत्तर भारत विशेषकर उत्तरप्रदेश में बड़े पैमाने पर कांवड़ यात्रा का आयोजन होता आया है तो देशभर के बाकी हिस्सों में भी आजकल कांवड़ यात्रा निकाली जाने लगी है।

उत्तरप्रदेश में कांवड़ यात्रा हमेशा सुर्खियों में रहती है क्योंकि यहां बड़ी तादाद में श्रद्धालुगण उत्साह के साथ शामिल होते हैं। इस बार सूबे के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांवड़ियों के लिए कई सुविधाएं दी हैं और हेलीकॉप्टर से पुष्प बरसाकर उनका स्वागत भी किया जा रहा है।

इस यात्रा में विचित्र वेशभूषा वाले साधुओं से लेकर आम आदमी तक शामिल होते हैं। तिरंगा झंडा वाले भव्य कांवड़ और गोल्डन बाबा (कई किलो सोना पहनने वाले बाबा) इस बार की यात्रा में आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं। श्रद्धा, भक्ति, उत्साह और आस्था भरी इस यात्रा पर कुछ दिनों से सवाल उठाए जा रहे हैं। बात दरअसल यह हुई कि दिल्ली के पास कांवड़यात्रियों से एक कार टकरा गई और उसके बाद कांवड़ियों ने कार में तोड़फोड़ की। इसके बाद मीडिया में कांवड़यात्रियों को गुंडों की तरह पेश करने की घृणित कोशिश शुरू हुई।

इतने बड़े आयोजन में कुछ असमाजिक तत्व शामिल होकर कोई वारदात कर दें तो इसके लिए सभी कांवड़ियों को गुंडा कहना कहां तक उचित है? कुछ आतंकी वारदातों पर क्या एक पूरे मजहब पर ही आतंकवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है? हर सार्वजनिक जमावड़े में कुछ असामाजिक तत्व शामिल हो ही जाते हैं, लेकिन इसकी वजह से आस्था पर चोट क्यों? बिना जांच के आखिर ये कैसे पता कर लिया गया कि गलती कांवड़ियों की ही है?

चिदम्बरम के लॉजिक से सोचा जाए तो क्या ग्यारंटी है कि उत्पात मचाने वाले कांवड़िए ही थे? भगवा कपड़े पहनकर कोई बदमाश या फिर किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता भी तो वारदात अंजाम दे सकते हैं? कांवड़ यात्रा को बदनाम करने की ये कोई साजिश भी हो सकती है। इसलिए ऐसी किसी एकाध घटना पर पूरी यात्रा और आस्था और प्रश्नचिन्ह लगाना कहीं से भी बुद्धिमानी नहीं है। ऐसी किसी धारणा बनने से रोका जाना बहुत ज़रूरी है क्योंकि देश की सामाजिक समरसता के लिए ये ज़रूरी है।

-सचिन पौराणिक

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