जनता को अहंकारी नेता पसंद नहीं…

0

राजनीति परसेप्शन का खेल है। किसी नेता या फिर पार्टी के प्रति जनता के मन में एक बार जो परसेप्शन बन जाता है, उसे मिटाना कभी आसान नहीं होता है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, तब नेता ऐसी छोटी-मोटी बातों का विशेष ध्यान रखते हैं, जो जनता के दिल को छू लेती है। कभी कोई नेता भीड़ में से किसी को मंच पर बुला लेते हैं तो कभी खुद को जनता का बेटा, सेवक, रक्षक जाने क्या-क्या बताते रहते हैं।

जनता के बीच परसेप्शन बनाने में आजकल भाजपा के नेता बहुत कुशल हो गए हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान खुद को प्रदेश के बच्चों का मामा कहलवाते हैं। मंच से हजारों बार खुद को किसानों का, ओबीसी का,  वृद्धों का,  बेटियों का सबसे बड़ा हितैषी बताते रहते हैं। आजकल वे प्रदेश की जनता से अगले चुनाव के लिए आशीर्वाद लेने के लिए जनआशीर्वाद यात्रा निकाल रहे हैं। यहां भी कई बार वे ऐसे वादे और दावे कर रहे हैं, जिन पर हंसने का मन होता है, लेकिन परसेप्शन उनका सकारात्मक बन रहा है। मामाजी चाहे नौटंकी ही करें तब भी जनता उन्हें पसंद कर रही है जबकि कांग्रेस के नेता लगातार विपक्ष में बैठने के बाद भी लगता है कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है।

पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया में वायरल हो रहे वीडियो के अनुसार, मध्यप्रदेश में चुनाव प्रचार कर रहे कांग्रेस के बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया एक शख्स द्वारा भेंट किए गए नारियल को अपनी कार की खिड़की से फेंकते हुए नज़र आए। जब प्रदेश में इसी साल चुनाव है, तब सिंधिया का ऐसा संवेदनहीन कारनामा उन्हें और उनकी पार्टी को भारी पड़ सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का बयान “कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है और मंदिर जाना हमारी बड़ी भूल थी” अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि सिंधिया का कार की खिड़की से नारियल फेंकना प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता पाने की उम्मीदों पर पानी फेर सकता है।

माना कि श्रीमंत सिंधियाजी बहुत धनवान महाराजा हैं, लेकिन उनका यह अहंकारी रवैया जनता को बिल्कुल भी रास नहीं आ रहा है। जनता पूछ रही है कि श्रीमंत को जब नारियल फेंकना ही था तो इसे स्वीकार ही क्यों किया?  इतना अहंकार उसी जनता को क्यों दिखाया जा रहा है, जिससे आपको उम्मीद है कि वे आपको वोट देंगे? राजा-महाराजाओं के दिन लद गए, लेकिन श्रीमंत का अहंकार सातवें आसमान पर क्यों जा रहा है? सिंधिया राजघराने के इतिहास पर रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ अंग्रेजों के लिए मुखबिरी करने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन सिंधिया जैसे नेताओं को गांधी-नेहरू परिवार के पीछे हमेशा नतमस्तक खड़ा देखकर कभी-कभी महसूस होता है कि वे आरोप भी शायद सच ही होंगे। एक खानदान के सामने हमेशा झुके रहना और जनता जनार्दन के तोहफों को ऐसे फेंकना आखिर क्या दर्शाता है ?

श्रीमंत को यह समझना चाहिए कि जनता के आशीर्वाद के बल पर ही वे संसद तक पहुंचे हैं और इसी जनता के आशीर्वाद के भरोसे वे प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब भी देख रहे हैं, लेकिन जनता का ऐसे अपमान किया जाएगा तो जनता आपको फिर से विपक्ष में ही बैठा देगी। हैरानी इसलिए भी होती है कि कांग्रेस समर्थक और कार्यकर्ता भी ऐसी हरकत का विरोध नहीं कर रहे हैं जबकि पहली आवाज़ वहीं से उठनी चाहिए थी।

गौरतलब है कि एक महिला का पासपोर्ट जारी करने और एक अधिकारी का तबादला करने पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की सबसे ज्यादा आलोचना भाजपा समर्थकों ने ही की थी, लेकिन कांग्रेस समर्थक ऐसी किसी बात पर विरोध का एक शब्द भी कहने के बजाय शुतुरमुर्ग बनना ज्यादा पसंद करते हैं। मध्यप्रदेश में इसी साल होने वाले चुनाव के पहले श्रीमंत का ऐसा अहंकारी चेहरा जनता के सामने आने की कीमत पूरी कांग्रेस को चुकानी पड़ेगी। मामाजी शिवराजसिंह चौहान से प्रदेश की जनता त्रस्त है,  गुस्सा है और ज्योतिरादित्य ही एकमात्र विकल्प नज़र आ रहे थे, लेकिन इस एक घटना से उनके प्रति जनता का परसेप्शन बहुत खराब हो गया है।

इधर, मामाजी की जनआशीर्वाद यात्रा में वे विनम्रता से जनता से मिल रहे हैं और उनकी नाराज़गियों को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अभी चुनाव में बहुत समय है और बाज़ी कई बार पलटने का अनुमान है,

लेकिन तब भी चुनावी फुटबॉल के इस मैच में पहले कुछ मिनटों में अपने खिलाफ परसेप्शन बनाकर श्रीमंत ने पहला ‘सेल्फ गोल’ कर ही लिया है। महाराज की वापसी तभी संभव है, जब वे महाराजों वाली अपनी अकड़ अपनी जेब मे रखें। जनता को अहंकारी नेता बिल्कुल पसंद नहीं आते।

-सचिन पौराणिक

Share.