Talented View : जजमेंटल ने दी दर्शकों को ये कैसी सज़ा?

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कल रविवार था सो कंगना की फ़िल्म ‘जजमेंटल है क्या’ ( Judgementall Hai Kya) देखने का प्लान बना लिया। फ़िल्म की शुरुवात में डिस्क्लेमर था कि इस फ़िल्म का मकसद किसी तरह के मनोरोगियों का मजाक उड़ाना नही है। फ़िल्म देखने पर लगा भी की फ़िल्म में मानसिक रोगियों का बिल्कुल भी मज़ाक नही उड़ाया गया है बल्कि उनका पक्ष समझाने की कोशिश की गई है, लेकिन फ़िल्म खत्म होने तक ये लगने लगा की फ़िल्म मनोरोगियों का मज़ाक भले न बना रही है, लेकिन अच्छे दिमाग वालों का जरूर बना रही है।

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कंगना रानौत (Kangana Ranaut ), राजकुमार राव ( Rajkumar Rao ) और जिम्मी शेरगिल (Jimmy Shergill) जैसे सितारों के होते हुए भी हॉल में दर्शक उबासियाँ ले रहे हो, तो समझ जाना चाहिये कि फ़िल्म ( Judgementall Hai Kya) कितनी बकवास है। पूरी फ़िल्म देखने के बाद भी ये स्पष्ट नही हो पाया कि इसे आखिर बनाया क्यों गया है? मानसिक रोगियों का पक्ष समझाने के लिए भले-चंगो को भी मानसिक बना देना आखिर कहाँ तक सही है? अगर कोई अकेला शख्स ये फ़िल्म देखकर आये तो हो सकता है कि वो खुद को कमरे में बंद करके कोड़े मारे। वो खुद को सज़ा देगा कि आखिर ये फ़िल्म उसने देखने की सोची ही क्यों?

‘क्वीन’ देखकर कंगना की फैन बनी जनता ने ‘सिमरन’ को भी झेला और ‘जजमेंटल’ को भी झेल लेगी, लेकिन इसके बाद कंगना की फ़िल्म देखने जाने का रिस्क वो शायद ही कभी ले पाएं। फ़िल्म में कंगना अपने केरेक्टर में पुरी तरह घुस गयी थी, लेकिन फ़िल्म ( Judgementall Hai Kya) देख रहे दर्शक समझ नही पा रहे थे कि वो क्यों इस फ़िल्म को देखने सिनेमाघरों में घुस आए है? हॉल से बाहर निकल रहे लोग हिसाब लगा रहे थे कि जितने पैसे टिकट में बिगाड़े उन पैसो से क्या ढंग का किया जा सकता था? फ़िल्म में कंगना की अदाकारी अच्छी लगी, लेकिन ये भी इसलिए अच्छी लगी क्योंकि और कुछ अच्छा लगने लायक फ़िल्म में था ही नही।

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राजकुमार और जिम्मी शेरगिल के लिए फ़िल्म में कुछ खास करने को था नही। एक बार तो लगा कि फ़िल्म बीच मे छोड़कर ही बाहर निकल आना चाहिये। इसलिए इंटरवल के पहले ही मैंने इस फ़िल्म के रिव्यूज़ पढ़ने शुरू किए, लेकिन ताज़्ज़ुब ये की ज्यादातर लोगों ने फ़िल्म को बेहतरीन और कंगना की अदाकारी को शानदार बता रखा था। ये सोचकर की शायद अगले भाग में फ़िल्म में कुछ होगा मैं फिर से अपनी सीट पर आकर बैठ गया, लेकिन फ़िल्म के खत्म होने तक मुझे खुद के जजमेन्ट पर शक होने लग गया। मैने ये जानने की कोशिश की क्या सिर्फ मुझे ही ये फ़िल्म बर्बाद लगी या फिर सभी को। लेकिन आसपास वालो ने एकसुर में कहा कि फ़िल्म वाकई पकाऊ है। अब ये रिव्यूज़ लिखने वाले नार्मल है या फिर फ़िल्म का असर मुझ पर हो गया ये मैं नही जानता, लेकिन ये तय है कि रविवार की मौज फ़िल्म की बोरियत में बह गयी।

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एकता कपूर और प्रकाश कोवलामुदि को देश को बताना चाहिए कि दर्शकों को किस बात की सज़ा दी गयी है? कहीं एक बार पढ़ा था कि हम सभी किसी न किसी लेवल के मनोरोगी है। ये फ़िल्म देखकर यकीन हो गया कि ये बात वास्तव में सच है। ऐसा नही होता तो न ऐसी फिल्में बनती और न हम जैसे उसे देखने सिनेमाघर जाते।

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