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हिन्दी है, तभी हम सब हैं..!

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किराना की दुकान पर कल कुछ सामान लेने गया था। एक बच्ची भी वहां से मैगी का बड़ा पैकेट खरीद रही थी। दुकानदार ने पैकेट देते हुए कहा- बेटा, पचहत्तर रुपए। बच्ची को कुछ समझ नहीं आया तो उसने फिर पूछा – कितने रुपए हुए अंकल? दुकानदार एक बुजुर्ग व्यक्ति थे, उन्होंने दोबारा कहा कि पचहत्तर रुपए हुए हैं बेटा, लेकिन बच्ची के चेहरे पर अब भी असमंजस के ही भाव थे। मैंने तुरन्त परिस्थिति समझकर बच्ची से कहा, ‘सेवंटी फाइव’ रुपए हुए हैं। यह सुनते ही बच्ची ने राहत की सांस ली और 100 का नोट दुकानदार को दे दिया। बच्ची के जाने के बाद दुकानदार को समझ आया कि उसे दरअसल हिन्दी की गिनती ही नहीं आती थी इसलिए वह कुछ समझ नहीं पा रही थी।

हालांकि ऐसे किस्से आजकल आम हो चले है, लेकिन दु:ख तब और ज्यादा होता है, जब ऐसे बच्चों के माता-पिता भी बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारा बेटा शुरू से कॉन्वेंट में पढ़ा है इसलिए इसे हिन्दी की गिनती समझ ही नहीं आती। कॉन्वेंट संस्कृति इस देश पर इतनी हावी हो चुकी है कि बच्चों को अपनी ही मातृभाषा और संस्कारों से दूर कर दिया गया है। देश में आज हिन्दी साहित्य की भी दुर्दशा चल रही है। अंग्रेजी साहित्य के 10 अच्छे लेखकों के नाम कोई भी बता देगा, लेकिन हिन्दी भाषा के दो बेहतरीन कहानीकार या साहित्यकारों के नाम आज किसी को याद नहीं होंगे। देश के लोगों के अंग्रेजी के प्रति इसी आग्रह के कारण भारत के उपन्यासकारों को भी अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ रहा है। हिन्दी में लिखे किसी उपन्यास के बजाय जनता ज्यादा सम्मान से अंग्रेज़ी में लिखी गई किसी किताब को देखते हैं| यह भी एक वजह है कि हिन्दी में लिखने से लोग कतराने लगे हैं।

हिन्दी के घटते प्रभाव की जिम्मेदार सरकारें भी रही हैं क्योंकि ऐसा माहौल देश में बना दिया गया है कि आगे बढ़ने और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना ज़रूरी हो गया। इसकी वजह से धीरे-धीरे देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ सी आ गई, जिसमें कॉन्वेंट स्कूलों ने आसानी से अपने पैर जमा लिए। जिस अंग्रेजी भाषा से देश की 99% जनता अनजान थी, उसी भाषा में परीक्षाएं करवाकर सरकारों ने देश की लाखों प्रतिभाओं का भी गला घोट दिया। इतना सब होने के बाद भी आज के परिदृश्य में हिन्दी के प्रादुर्भाव का श्रेय निस्संदेह तकनीक को जाता है क्योंकि मोबाइल, लैपटॉप के जमाने में तकनीक द्वारा हिन्दी लिखना बेहद सुगम हो चला है। इस वजह से पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया पर हिन्दी लिखने वालों की तादाद यकायक बढ़ी है। सोशल मीडिया के चाहे लाख दुष्प्रभाव रहे हो, लेकिन हिन्दी के पुनरुद्धार में इसका एक बहुत बड़ा हाथ है।

सोशल मीडिया में आजकल हिन्दी में लिखने वाले छाए हुए हैं क्योंकि हिन्दी में लिखी गई बातें सीधे दिल में उतर जाती हैं। कोई माने चाहे न माने, लेकिन हिन्दी इस देश की आत्मा में रची-बसी है। हिन्दी उतनी ही मीठी है, जितनी मां के हाथ से बनी मिठाई। हिन्दी में बोलना ऐसा है मानो मां के आंचल में छिप जाना। भारतवासियों का हिन्दी से लगाव बहुत स्वाभाविक है क्योंकि हिन्दी का दर्जा हमारे लिये मां के समान है। हिन्दी एक राष्ट्र की चेतना के रूप में हमारा प्रतिनिधित्व करती है। हिन्दी के बिना हिंदुस्तान के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, शायद इसीलिए देश को आज़ादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एकमत से हिन्दी को राजभाषा घोषित किया गया था। आपने देखा होगा कि हिन्दी फिल्मों के नायक-नायिका अपने साक्षात्कार हमेशा अंग्रेजी में देते हैं, लेकिन यदि वे अपनी फिल्में भी अंग्रेजी में ही बनाने लगे तो जनता उन्हें तुरंत नकार देगी।

अंग्रेजी को उच्चतर समझने वालों का यह भ्रम दूर करना ज़रूरी है क्योंकि सच्चाई सभी को पता होनी चाहिए कि हिन्दी भाषा ने ही उन्हें प्रसिद्धि और दौलत दिलाई है। भारतीय संगीत की दुनियाभर में जो धूम मची है, उसका श्रेय भी हिन्दी भाषा को ही जाता है। आज ज़रूरत सिर्फ देश के भविष्य निर्माता यानी बच्चों को हिन्दी से दूर होने से बचाने की है। यदि आपका बच्चा अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भी पढ़ रहा है तो कम से कम हिन्दी के शब्दों, अक्षरों और गिनती से वह अनजान न रहे, इतना तो अभिभावक कर ही सकते हैं। आज “हिन्दी दिवस” के मौके पर सभी यह संकल्प लें कि कोई भी बच्चा हिन्दी की गिनती और अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ न रह पाए क्योंकि

-सचिन पौराणिक

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