समाज किस दिशा में जा रहा है ?

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शिवजी के गले में नाग लिपटा हुआ है तो उनका वाहन नंदी है। गणेशजी का मस्तक हाथी का है जबकि वाहन मूषक है और कार्तिकेय का मयूर। इस प्रकार शिव परिवार सिर्फ आस्था का ही नहीं बल्कि जैव-विविधता का भी उपयुक्त उदाहरण है। हमारे पुराणों में पशु-पक्षियों से जुड़ी ऐसी अनेक कहानियां मौजूद हैं, जिनमें इन सभी को मनुष्य के मित्र के रूप में दिखाया गया है।

महाभारत में भीष्म पितामह की वह कहानी भी सभी को विदित है, जिसमें 100 जन्म पहले एक सांप को भूलवश कांटों में फेंकने का फल उन्हें अपने जीवन के अंतिम दिनों में शरशय्या पर लेटकर चुकाना पड़ा था। रामचरितमानस में माता सीता के हरण के दौरान जटायु नाम के एक गिद्ध ने उन्हें छुड़ाने के लिए अपने प्राणों को आहुति दी थी। इसी प्रकार लंका पर चढ़ाई के लिये समुद्रसेतु बनाते समय भी रीछ-वानरों की सेना के अलावा समुद्री जंतुओं ने भी सेतुनिर्माण में योगदान किया था। एक छोटी सी गिलहरी ने भी किस प्रकार सेतु निर्माण में अपना योगदान दिया, यह हमारे शास्त्रों और पुराणों की कहानियां हमें बताती हैं।

पशु-पक्षियों से जुड़ी ऐसी कहानियां पहले के समय में बच्चे बचपन में सुना करते थे इसलिए प्राणियों के प्रति उनके मन में सहानुभूति और प्रेम की भावना स्वाभाविक रूप से घर कर जाती थी, लेकिन आजकल सरकारें धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर चलने लगी हैं, जिसकी वजह से हिन्दू आस्था से जुड़ी कहानियां बच्चों को स्कूलों में नहीं पढ़ाई जा रही हैं। इस थोथी धर्मनिरपेक्षता के घिनौने दुष्परिणाम अब निकलकर सामने आने लगे हैं।

हरियाणा के मेवात से चौंकाने एक ऐसी चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसे सुनकर यकीन करना मुश्किल हो रहा है। यहां एक बकरी के साथ 8 लोगों ने दुष्कर्म किया, जिससे आखिरकार बकरी की मौत हो गई। बकरी के मालिक ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाते हुए कहा कि बकरी को आरोपी सूने मकान में ले गए और उसके साथ बारी-बारी से गलत काम किया। बताया जा रहा है कि बकरी गर्भवती थी| वह ऐसा अप्राकृतिक कृत्य बर्दाश्त नहीं कर सकी, जिससे उसकी मौत हो गई।

हारून, जफ़र सहित तीन लोगों की इस मामले में पहचान कर ली गई है, लेकिन असली सवाल यह है कि देश में क्या अब महिलाओं और बच्चियों के साथ ही पशु भी सुरक्षित नहीं है?  महिलाओं के तंग कपड़ों को बलात्कार की वजह बताने वालों को अब बताना चाहिए कि क्या बकरियों को भी अब बुर्का पहनाया जाए? बकरी के साथ गलत होते हुए उसके मालिक ने देख लिया इसलिए यह मामला सुर्खियां बना है, लेकिन क्या ग्यारंटी है कि यह ऐसा पहला मामला है? चूंकि बेचारे जानवर यह बयां भी नहीं कर सकते कि उनके साथ क्या किया गया इसलिए ऐसे मामले सामने आ पाना बेहद मुश्किल है।

सोचने की बात है कि आखिर किस मनोदशा के व्यक्ति होंगे वे, जो जानवरों के साथ ऐसी हरक़तें करने में लगे हैं? यदि यह मानसिक विक्षिप्तता है तो ऐसे लोगों का इलाज करवाया जाए या फिर उनको कोई ऐसी सज़ा दी जाए, जिससे वे समाज में आज़ादी के साथ न घूम सके। किसी के मानसिक विक्षिप्त होने की कीमत कोई बेकसूर महिला या पशु आखिर क्यों चुकाए? आखिर किस दिशा में जा रहा है हमारा समाज? अक्सर यह कहा जाता है कि विकास और तकनीक किसी काम के नहीं यदि देश में महिलाएं सुरक्षित नहीं, लेकिन जानवर भी इस वहशीपन के शिकार हो जाएंगे, यह बात किसी के जेहन में नहीं आई थी।

अब समय की यही मांग है की ऐसे मानसिक विक्षिप्त या हवसी दरिंदों को पागलखाने में डाला जाए या फिर उनके अंगदान करवाकर फांसी की सजा दे दी जाए। दूसरी तरफ स्कूली पाठ्यक्रम में पुनः पुराणों और शास्त्रों की कहानियां शामिल कराई जाए, जिससे बच्चों के मन में बचपन से ही जानवरों और सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और साहचर्य का भाव पैदा हो सके। करुणा, सहानुभूति और प्रेम के भाव ऐसी कहानियों के माध्यम से बच्चों में सहज फलित होते हैं। बच्चे ही देश का भविष्य हैं और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बच्चों के साथ ही देश के भविष्य को दांव पर नहीं लगाया जा सकता है।

-सचिन पौराणिक

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