सरकार के लिए ‘सामान्य’ कुछ भी नहीं…

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दहेज विरोधी कानून में इतने सख्त प्रावधान थे कि किसी शादीशुदा महिला के दहेज प्रताड़ना के झूठे आरोप लगा देने भर से भी एक पक्ष के लोगों को तुरन्त जैल में गैर-जमानती धाराओं में जब्त कर लिया जाता था। इस कानून का इतना दुरुपयोग हुआ कि आखिर सरकार को किसी भी दहेज प्रताड़ना की शिकायत पर तत्कार गिरफ्तारी पर रोक लगानी पड़ी। ये फ़ैसला बिल्कुल जायज़ था, क्योंकि इसका उपयोग कम दुरूपयोग अधिक हो रहा था। इसके अलावा बिना किसी जांच और अपना पक्ष रखने की इजाज़त दिए बिना किसी को गिरफ़्तार करना तर्कसम्मत भी नही है।

अक्सर लड़ाईयों में ऐसा होता है कि जिस बात पर झगड़ा हो उसके अलावा भी कई आरोप शिकायत में केस मजबूत करने के लिए लगा दिए जाते हैं। मसलन अगर किसी दुकानदार का ग्राहक से झगड़ा होता है, नौबत हाथापाई तक आ जाती है तो ग्राहक बदसलूकी, मारपीट के अलावा जान से मारने की धमकी का आरोप दुकानदार पर लगाता है, तो दुकानदार भी झगड़े से इतर गल्ले में रखे पैसे लूटने का आरोप ग्राहक के माथे मढ़ देता है। पुलिस भी सब जानती है कि असल मामला क्या है और कौन से आरोप फर्जी हैं, लेकिन कानून अपने हिसाब से काम करता है। अगर एकतरफा कार्यवाही का कोई कानून बना दिया जाए कि आपको एक पक्ष की रिपोर्ट पर दूसरे पक्ष को बिना अपनी बात कहने का मौका दिए, बिना किसी जांच के गिरफ्तार करना पड़े तो क्या ये न्यायसंगत है?

देश की सुप्रीम कोर्ट ने ये बात समझते हुए समझदारी भर निर्णय सुनाया था कि  एससी-एसटी एक्ट में अगर कोई शिकायत दर्ज करायी जाती है, तो बिना पुलिस की जांच के किसी को गिरफ्तार ना किया जाए। कोर्ट का ये फैसला दलित विरोधी नहीं बल्कि समानता समर्थक था, क्योंकि कई बार ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां दुर्भावनापूर्वक एससी-एसटी एक्ट में आरोप दर्ज कराए गए और किसी बेगुनाह को बेवजह ही सलाखों के पीछे रहना पड़ा।

देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुक्तकंठ से सराहना की थी, लेकिन देश मे वोटबैंक की राजनीति इतनी हावी हो चली है कि 56 इंच की छाती का दम भरने वाले श्रीमान भी कोर्ट के इस फैसले को बदलने पर अड़े हैं। ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ का दम भरने वाली भाजपा 2019 का चुनाव जीतने के लिए अपने मूल्यों से इतनी जल्दी समझौता कर लेगी ऐसा किसी ने सोचा न था। अपने दम पर सत्ता हासिल करने वाली पार्टी एससी-एसटी वोटों के लिए ऐसा लचर रवैया अपनाएगी इसकी भी उम्मीद नही थी। देश के गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि  अजा-जजा अत्याचार रोधी कानून मूल रूप में बहाल करने के लिए इसी सत्र में संशोधन विधेयक पारित करा लिया जाएगा।

इधर, सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण को लेकर भी एक संविधान पीठ गठित कर दी गयी है। ऐसे में देश का सामान्य वर्ग सोच रहा है कि जब सारी सुविधाएं अल्पसंख्यक, एससी, एसटी और पिछड़ों को ही मिलनी है, तो सरकार एक अध्यादेश लाकर सामान्य वर्ग को देश से बाहर निकालने का कानून क्यों नही बना देती? जब सामान्य वर्ग के बच्चों को नौकरी नही देना है, प्रमोशन में भी काबिलियत की जगह जाति देखना है, किसी एक झूठी शिकायत पर सलाखों के पीछे भी जाना है, तो आखिर सामान्य वर्ग जिंदा रहकर भी क्या कर लेगा? देश जानना चाहता है कि आखिर सामान्य वर्ग का कसूर क्या है?

सरकार की नीयत साफ है, तो ऐसा भी कोई क़ानून बनाओ कि किसी नेता पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगते ही बेगुनाही साबित होने तक जेल में डाल दिया जाए तो?  पांचवी फैल, आठवी फैल, अनपढ़, आवारा लोग नेता बनकर हम पर राज करेंगे, तो यही सब देखने को मिलेगा। 56 इंच की सरकार से उम्मीद थी कि कम से कम वो किसी दबाव में आये बिना सकारात्मक राजनीति करेंगे, लेकिन श्रीमान का ध्यान चुनाव जीतने से आगे कहीं जाता ही नही है।

कांग्रेस समेत बाकी विपक्षी दल खुद वोट बैंक की राजनीति के दलदल मे इतने गहरे धंसे हुए हैं कि वह कोई विकल्प है ही नहीं| देश की राजनीति में अच्छे विकल्प की कमी ऐसे मौकों पर बहुत खलती है। जब दहेज विरोधी कानून के दुरूपयोग पर इसमे संसोधन किया जा सकता है, तो अजा-जजा कानून में संसोधन क्या सिर्फ वोट के लिए नही किया जा रहा? सरकार को इस मुद्दे पर अपने कदम पीछे खींचते देख देश का सामान्य वर्ग हैरान है। सामान्य वर्ग के युवाओं को देशप्रेम की खोखली बातों में आने की बजाय कहीं विदेश में ही अपना करियर बनाने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि सरकार उन्हें स्वाभिमान से इस देश में नहीं  जीने देगी। अमरीका में भारतीय बुद्धिजीवी, डॉक्टर, वैज्ञानिक शायद इसीलिए इतनी बड़ी संख्या में जाकर बस चुके हैं, क्योंकि अपने देश मे प्रतिभा की नहीं जाति की कद्र होती है।

– सचिन पौराणिक 

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