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Talented View : मंदी चालू, गाड़ी बंद

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वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नापने के लिए सरकार “बीएस” यनेकी भारत स्टेज़ मानक को अपनाती है। इसी मानक के ज़रिए सरकार गाड़ियों के इंजन से निकलने वाले धुंए और प्रदूषण को रेग्युलेट करती है। इसका पैमाना बड़ा सीधा है। बीएस- 3 गाड़ी यनेकी ज्यादा प्रदूषण, बीएस-4 यनेकी कम प्रदूषण और बीएस-6 वाहन अर्थात सबसे कम प्रदूषण।

Talented View : बड़बोला पाक

कुछ समय पहले सरकार ने प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए बीएस-3 दुपहिया वाहनों पर प्रतिबन्ध लगाया था। किंतु भारत की देशप्रेमी और पर्यावरण प्रेमी जनता ने इन वाहनों पर मिल रही छूट का भरपूर लाभ उठाते हुए सारे बीएस-3 वाहन खरीद लिए। कुछ पैसों की बचत के लिए हम पर्यावरण की चिंता भला क्यों करते? और फिर ये तर्क भी था जनता के पास की हम नही खरीदेंगे तो कोई और खरीद लेगा। पर्यावरण तो प्रदूषित होगा ही, तो क्यों न हम ही ये शुभ काम कर लें?
खैर, फिलहाल देश मे चर्चा चल रही है ऑटो सेक्टर में आयी मंदी की। ऐसा बताया जा रहा है कि कारों पर भारी डिस्काउंट के बाद भी बज़ार में सन्नाटा है। कई कंपनियों की उत्पादन यूनिट बंद करना पड़ रही है। लाखों लोगों के रोज़गार पर संकट आ गया है। इसे आर्थिक मंदी की दस्तक के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या वाकई कारों की बिक्री पर असर आया है या फिर जनता जागरूक हो गयी है? ये मंदी की आहट है या अक्लमंदी की?

Talented View : हम किसी से कम नहीं

बीएस 3 वाहनों की तुलना में बीएस 4 वाहन न सिर्फ प्रदूषण कम करतें है बल्कि गाड़ी का एवरेज भी बड़ा देतें है। कारों की बात करें तो पुरानी गाड़ियां जहां 15 से 20 तक का एवरेज निकाल रही है वहीं नयी, अपडेटेड गाड़ियां 25 से 30 तक एवरेज दे रही है। ग्राहक ये बात अच्छे से समझ रहा है। 1 अप्रेल 20 के बाद से मार्केट में सिर्फ बीएस-6 वाहन बिकेंगे जिनका एवरेज इससे भी ज्यादा हो सकता है। हालांकि इससे पहले बिक चुके वाहनों पर कोई प्रतिबंध नही रहने वाला है लेकिन तब भी ग्राहक नई तकनीक और बेहतर माइलेज को ही तरज़ीह दे रहे है।

एक साल रुककर अगर बेहतर गाड़ी मिल रही है तो जिसे गाड़ी खरीदने की कोई जल्दी नही है वो ग्राहक इंतज़ार करने के मूड में है। सिर्फ वही ग्राहक गाड़ी खरीद रहे है जिन्हें इसकी अत्यंत आवश्यकता है। इसके अलावा ये बात भी सही है कि ओला, उबर जैसी टेक्सी कंपनियों की उपलब्धता की वजह से भी लौग स्वयं की गाड़ी खरीदने से कतरा रहे है। ओला,उबर की टेक्सियों से ही जब काम चल रहा है तो कोई क्यों खामखा लाखों रुपये लगायेगा? गाड़ियों के प्रोडक्शन बंद होने कि जो बात कही जा रही है वो भी अर्धसत्य है।

Talented View : चाँद पर लगेगा भारत का झंडा

कुछ कंपनियों ने अपना प्रोडक्शन अस्थायी तौर पर बंद जरूर किया है लेकिन इसकी वजह गोदाम में भरपूर मात्रा में रखी गाड़ियां भी है। इसके अलावा जब 2019 में नई गाड़ियां ही बिकेंगी तो पुरानी गाड़ियों का ज्यादा प्रोडक्शन कोई क्यों करेगा? इन तमाम वजहों के मद्देनजर ऑटो सेक्टर सुस्ती का शिकार हो गया है। ग्राहक की नजरों से देखें तो उसे इस मंदी से कोई फर्क नही पड़ रहा है, बल्कि फायदा ही दिखाई दे रहा है। कार कंपनियों और उनके कामगारों पर इसका आंशिक असर जरूर हुआ है। सभी उद्योगों में थोड़ी उठापटक तो चलती ही रहती है। ये दौर भी गुज़र जाएगा, लंबे नज़रिए से देखें तो भारत का ऑटो सेक्टर उम्मीदों और अवसरों से भरा हुआ क्षेत्र है।
-सचिन पौराणिक
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