देश को कमजोर करने वालों का विरोध करो

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एक अटल बिहारी वाजपेयी थे और आज एक मायावती है| अटलजी जब देश के प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने 10 से भी ज्यादा छोटे-बड़े दलों से गठबंधन करके सरकार चलाई थी। अटलजी की नरमपंथी और सर्वसमावेशी छवि की वजह से कई विरोधी विचारधाराओं के दल भी एनडीए में शामिल हुए, लेकिन इतने बड़े कुनबे को संभालना भी कहां आसान था। कभी एक दल सरकार को समर्थन वापसी की धमकी देता तो कभी दूसरा। इसी उहापोह और असमंजस के बीच वाजपेयीजी कभी खुलकर वह काम नहीं कर सके, जो वे करना चाहते थे।

हालांकि देश को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनाने के लिए वाजपेयी सरकार ने जो हिम्मत और हौसला दिखाया, वह बेमिसाल था। जॉन अब्राहम की हालिया रिलीज़ फ़िल्म ‘परमाणु’ में बेहतरीन तरीके से बताया गया है कि ऐसे वक्त में जब अमरीका के सैटेलाइट भारत पर लगातार नज़र रख रहे थे, तब भारत सरकार ने सिर्फ अपनी इच्छाशक्ति और देशभक्त परमाणु टीम के बल पर किन हालातों में परमाणु परीक्षण किया और देश को शक्तिशाली राष्ट्र बनाया। केंद्र में एक मजबूत और दृढ़संकल्प वाली सरकार क्यों होनी चाहिए, यह बात देशवासी अब समझ गए हैं।

कल बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक बयान दिया कि देश को इस वक्त मजबूत नहीं बल्कि मजबूर सरकार की ज़रूरत है। बहनजी ने राजस्थान के अलवर के रकबर की लिंचिंग का जिक्र करते हुए कटाक्ष किया कि देश में लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में तब्दील हो चुका है। दलितों की पार्टी कहलाने वाली बसपा प्रमुख मायावती को अलवर के रकबर की फिक्र ज़रूर दिखाई दी, लेकिन उसी राजस्थान के बाड़मेर में एक दलित भाई खेताराम की लिंचिंग का उन्होंने जिक्र तक नहीं किया। गौरतलब है कि मायावती एक ऐसी नेत्री है, जो दशकों के राजनीतिक अनुभव के बाद भी आज तक लिखे हुए पर्चे के बिना नहीं बोल सकती है।

कुछ दिन पहले ही राहुल गांधी पर एक टिप्पणी करने पर उन्होंने अपनी ही पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी को निलंबित कर दिया था। देशभर में दलितों पर होने वाले अत्याचारों पर बहनजी का दोहरा रवैया स्पष्ट रुप से देखने को मिलता है। दलित पर अत्याचार यदि किसी स्वर्ण ने किया है तो बहनजी तुरन्त विरोध दर्ज कराएंगी, लेकिन यदि दलितों पर हिंसा अल्पसंख्यक समुदाय की तरफ से की जाती है तो उन्हें सांप सूंघ जाता है। उस घटना पर बसपा की ओर से कोई स्टैंड नहीं लिया जाता है। सवाल है कि कब तक बहुजन समाज सिर्फ वोट और राजनीति के लिए ही इस्तेमाल किया जाता रहेगा? बहनजी को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें दलितों की फ़िक्र ज्यादा है या अपने राजनीतिक समीकरणों को बचाने की?

बहनजी को ठोस तर्कों के आधार पर बताना चाहिए कि आखिर क्यों उन्हें देश में एक मजबूर सरकार चाहिए? क्या सरकार पर दबाव बनाकर अपनी अकूत दौलत को छिपाने और आय से अधिक संपत्ति के केस वापस लेने के लिए? क्या चुनाव में समर्थन के बदले मोटा माल वसूलने के लिए? क्या सरकार पर दबाव बनाकर खुद की राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए? क्या सरकार को धमकाकर मलाईदार मंत्रालय लेने के लिए? अपने उल्टे-सीधे काम निकलवाने के लिए? सवाल बहनजी से है कि आखिर कैसे दलितों की राजनीति करते-करते आप अरबों-खरबों की सम्पत्ति की मालकिन बन गई ? आखिर क्यों देश का दलित आज भी वहीं का वहीं है, लेकिन आप कैसे दौलत के शिखर पर पहुंच गईं ?

मायावती जैसी नेता, जो समाज के सिर्फ एक तबके के हक की झूठी लड़ाई लड़ती है, वह पूरे समाज के साथ कभी न्याय कर पाएंगी? अटलबिहारी सरकार के इरादे साफ थे और परमाणु परीक्षण गुप्त रखा गया, लेकिन यदि ऐसा नहीं होता, तब क्या देश कभी परमाणु शक्ति बन पाता? आज भी केंद्र में यदि कोई मजबूर सरकार होती तो देश की सेना क्या कभी म्यांमार और पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर पाती? बेशक केंद्र में एक मजबूत सरकार मायावती जैसे नेताओं को कभी रास नहीं आएगी क्योंकि तब मोल-भाव की कोई गुंजाइश नहीं रहती और कोई दबाव भी कम नहीं कर पाता। केंद्र में एक मजबूत इरादे वाली सरकार क्यों ज़रूरी है| यह बात अटलजी ने गठबंधन धर्म निभाकर भी देश को समझा दिया था।

परमाणु परीक्षण के पीछे की कहानी जिस प्रकार देश के सामने इतने साल बाद आई है, उसी प्रकार सर्जिकल स्ट्राइक, जीएसटी, नोटबन्दी जैसे साहसी फैसलों की कहानी भी शायद सालों बाद जनता के सामने आए। वर्तमान सरकार की नीयत साफ है, इसमें किसी को शक नही होना चाहिए। मायावती जैसे समाज को बांटने वाले नेताओं को अपने निजी स्वार्थ के लिए देश को बद्दुआ देना बंद कर देना चाहिए। मायावती, बसपा या किसी अन्य पार्टी से बड़ा देश है और देश को कमजोर करने वाली किसी भी बात का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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