तो कानून-व्यवस्था का ऐसे ही बनेगा मज़ाक

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उत्तरप्रदेश या बिहार से कोई मध्यप्रदेश, राजस्थान या अन्य किसी प्रदेश में रोज़गार के लिए पहुंचता है तो काफी आशंका यही होती है कि वह फिर कभी स्थायी तौर से अपने प्रदेश नहीं लौटने वाले हैं। ऐसे कितने ही परिवारों को मैं निजी तौर पर जानता हूं जो सरकारी महकमों मे बाबू-अफसर हैं और मूलतः उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं, लेकिन उन्होंने यहीं अपने घर बना लिए हैं और भविष्य में कभी अपने गृहराज्य लौटने की कोई इच्छा नहीं रखते।

वापस न लौटने की बात भी ठीक है, लेकिन उत्तरप्रदेश के लोगों की एक खासियत यह भी होती है कि जिस महकमे में वे रहते हैं, वहां अपने प्रदेश से बीसियों और लोगों को भी बुलाकर वहीं फिट कर देते हैं। पुलिस, सिंचाई, लोक निर्माण और सामान्य प्रशासन सहित हर महकमे में कई बाबू-अफसर आपको उत्तरप्रदेश के मिल जाएंगे। ऐसा क्या है मध्यप्रदेश या फिर अन्य राज्यों में कि ये लोग वापस अपने सूबे नहीं लौटना चाहते? इसका एकमात्र उत्तर है यहां की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक मुस्तैदी। उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ऐसा लगता है कि कानून नाम की कोई चीज़ है ही नहीं। यहां के हर घर में एक नेता और कुछ अवैध हथियार रखे मिलेंगे। इसके अलावा हथियार रखना और चलाना इनके शौक भी हैं।

पुलिस को ये लोग कुछ समझते नहीं और कानून का इन्हें कोई खौफ नहीं। उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में ऐसी ही हिंसक भीड़ ने कल एक पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी। एक अन्य युवक की भी गोली लगने से मौत हो गई है। बुलंदशहर के स्याना तहसील के एक गांव में ग्रामीणों को एक खेत मे कुछ हड्डियां और गोवंश के अवशेष दिखाई दिए। गोकशी के शक में पुलिस को सूचना दी गई। मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने मामले की जांच और कार्रवाई का भरोसा दिया, लेकिन ग्रामीण गुस्साए थे। ग्रामीणों ने सड़क पर जाम लगा दिया। जाम खुलवाने पहुंचे पुलिस अधिकारियों पर ग्रामीणों ने पथराव शुरू कर दिया। हालात बिगड़ते देख पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की, लेकिन हिंसक भीड़ ने पुलिस पर ही हमला बोलते हुए गोलियां चला दी।

इससे एक कोतवाल की मौत हो गई जबकि एक अन्य युवक भी गोली लगने से मारा गया।  उत्तरप्रदेश में गोलियां चलना आम बात है क्योंकि अवैध हथियारों के यहां सबसे बड़े जखीरे हैं, लेकिन यदि भीड़ पुलिस को भी कुछ नहीं समझ रही है तो इसके परिणाम अराजकता के रूप में ही निकलते हैं। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पूरे राज्य में लगातार मुठभेड़ में बदमाश मारे जा रहे हैं, लेकिन उसके बाद भी हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हालात ऐसे हो चुके हैं कि बदमाश भले ही अपनी हरकतें सुधार भी लें, लेकिन अवैध हथियारों के बल पर कब कौन बदमाश बन जाए कहा ही नहीं जा सकता है। सूचीबद्ध बदमाशों पर लगाम कसी भी जा सकती है, लेकिन जोश में आकर गोली चलाने वाले आम नागरिकों का क्या करें? इन्हें चिन्हित करना सबसे मुश्किल है।

उत्तरप्रदेश में लंबे समय तक ऐसा माहौल रहा है कि वहां बंदूक के दम पर हर काम करवाया जा सकता है। “जिसकी लाठी-उसकी भैंस” की तर्ज़ पर वहां अपराधियों का बोलबाला रहा है। अपराधियों के लिए ऐसा अनुकूल माहौल दशकों की प्रशासनिक नाकारी के बाद तैयार हुआ है। अब जाकर अपराधियों पर नकेल कसी जा रही है, लेकिन सवाल वही है कि जब राज्य के ज्यादातर लोगों के चरित्र का ही अपराधीकरण हो चुका है तो प्रशासन भी किस हद तक नकेल कसे? इन राज्यों के ऐसे बेकाबू हालात देखकर ही उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों के लोग किसी अन्य राज्य में अपना बसेरा बनाना ही बेहतर समझते हैं, लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

प्रशासन अपना काम करेगा, लेकिन जनता को भी इसमें सहयोग करना पड़ेगा। इसके लिए सबसे ज़रूरी है अवैध हथियारों पर लगाम कसना। अवैध हथियारों के कारखाने और इनके सौदागरों पर जब तक सख्ती से नकेल नहीं कसी जाएगी, उत्तरप्रदेश में कानून-व्यवस्था का ऐसे ही मज़ाक बनता रहेगा। ‘जिसके हाथ हथियार-उसकी सरकार’ वाली मानसिकता से जनता को बाहर निकल आना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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