Talented View: ऐसे काम नहीं करने चाहिए

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अंडमान के द्वीपों पर आज भी ऐसी जनजातियां रहती हैं, जिनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है। ‘जारवा’ नाम की इस जनजाति के क़रीब 400 लोग आज भी विकास की प्रारंभिक अवस्था मे ही जी रहे हैं। जिन द्वीपों पर ये रहते हैं वहां सैलानियों का प्रवेश सीमित है। सैलानी वहां गिनकर बोट द्वारा सुरक्षा इंतजामों के साथ लाए जाते हैं और फिर शाम ढलने के पहले ही गिनकर उन्हें वापस ले जाया जाता है। दुनिया से कटे होने की वजह से यह जनजाति खूंखार हो चली है, लेकिन दुनिया में सिर्फ अंडमान में ही इनके होने की वजह से इन्हें संरक्षित प्रजाति में रखा गया है।

अंडमान चूंकि एक बेहद सुंदर जगह है इसलिए यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं और विभिन्न द्वीपों पर घूमते हैं। हैवलॉक, नील और रॉस आइलैंड जैसे द्वीप पर्यटकों को बरबस ही अपनी सुंदरता से अपनी ओर आकर्षित कर लेते है। यहां के आधे से ज्यादा द्वीपों पर पर्यटकों के जाने की मनाही है क्योंकि कुछ द्वीप संरक्षित है तो कुछ पर भारतीय नौसेना और कोस्टगार्ड के खुफिया मिशन चलते हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से अंडमान एक खबर को लेकर सुर्खियों में है। एक अमरीकी सैलानी जॉन एलेन चाउ ऐसे ही एक संरक्षित सेंटिनल द्वीप पर स्थानीय मछुआरों की मदद से पहुंच गए। वहां वे आदिवासियों को प्रभु ईसा मसीह का संदेश सुनाना चाहते थे, लेकिन आदिवासियों ने तीर से उनको मार डाला।

मछुआरे जब कुछ दिन बाद तय समय के मुताबिक उसे वापस लेने पहुंचे तो देखा कि आदिवासी उसे रेत में दफना रहे हैं। धर्म परिवर्तन के आरोप लगातार झेल रही ईसाई मिशनरियां जॉन चाउ की हत्या से एक बार फिर निशाने पर आ गई हैं। इधर, अमरीका में रह रहे जॉन के माता-पिता ने एक पत्र लिखकर यह कहा है कि हमने अपने बेटे के हत्यारों को माफ कर दिया है। हम चाहते हैं कि आदिवासियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाए, लेकिन धर्म-परिवर्तन जैसे आरोप उनके बेटे पर न लगाए जाएं। यदि बाइबल साथ लेकर कोई ईसामसीह का संदेश देने आदिवासियों के बीच जाए तो उसकी मंशा क्या सही हो सकती है?

प्रभु यीशु का संदेश देने के लिए मिशनरियों को गरीब आदिवासी, वनवासी बंधु क्यों नज़र आते हैं? हमेशा ही कमजोर तबके के लोगों पर प्रभु यीसु के नाम का जाल क्यों फेंका जाता है? अब जो आदिवासी आज भी विकास के प्राचीनतम दौर में है उन्हें यीसु का संदेश देने का क्या तुक बनता है? इसमें यकीनी तौर पर कोई साजिश है। भोले आदिवासियों को प्रभु यीशु से जोड़कर, उन्हें बाइबिल थमाकर कुछ तो साबित करने की कोशिश की ही जा रही थी। यदि जॉन चाउ अपने इरादों में कामयाब हो जाता तो क्या दुनिया को यह बताने की कोशिश नहीं की जाती कि ईसाई धर्म दुनिया का प्राचीनतम है क्योंकि ये आदिवासी भी उन्हें मानते हैं।

ईसाई मिशनरियों के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए ये सब संभावनाएं वाज़िब लगती हैं। गरीबों की सेवा में कोई बुराई नहीं है, लेकिन यदि दवाई के बदले किसी गरीब के गले मे क्रॉस पहनाया जा रहा है तो इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए। सेवा के बदले धर्म का सौदा मिशनरियों के खतरनाक मंसूबे दर्शाता है।

यदि सेवा ही इनका एकमात्र लक्ष्य है तो क्यों इतने बड़े पैमाने पर जनजातियां ईसाई बन चुकी है? ईसाई मिशनरियों की यह कड़वी सच्चाई देश के सामने अब आ चुकी है। इन मिशनरियों के हौसले इसलिए बुलंद है क्योंकि विदेशी फंडिंग इन्हें जबरदस्त मिलती है। वर्तमान सरकार द्वारा मिशनरियों की मदद करने वाले कई एनजीओ पर लगाम कसी गई है, लेकिन जॉन चाउ जैसे लोगों की हत्या से कोई संवेदना नहीं होनी चाहिए। बदनीयती से किए गए अपराध के दौरान वे एक हादसे का शिकार हो गए, इसमें आदिवासियों की कोई ग़लती नहीं है। जॉन की मौत के असली जिम्मेदार वो मिशनरी है, जिन्होंने यीशु के संदेश के नाम पर एक युवा के मन मे इतना जहर घोल दिया कि वो अपनी जान की बाज़ी लगाने में भी पीछे नहीं हटा। अंडमान जैसी खूबसूरत जगह पर मिशनरियों के ऐसे गंदे काम बिल्कुल नहीं होने चाहिये। जॉन की मौत धर्म परिवर्तन में शामिल दलालों के लिए एक सबक होना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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