निष्पक्ष होनी चाहिए पत्रकारिता

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एक लोकप्रिय निजी समाचार चैनल से दो पत्रकारों को निकाले जाने की घटना देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। कहा जा रहा है कि सरकार के खिलाफ लगातार खबर दिखाए जाने से इन दोनों की छुट्टी हुई है। पुण्यप्रसून वाजपेयी और अभिसार शर्मा नाम के दोनों पत्रकारो को एबीपी न्यूज़ ने बाहर कर दिया है। पुण्यप्रसून को जहां तत्काल प्रभाव से चैनल छोड़ने को कह दिया गया है तो अभिसार शर्मा को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है।

इन दोनों के अलावा उसी चैनल के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। वाजपेयी इससे पहले आजतक में अपना शो करते थे, लेकिन चर्चा है कि अपने शो में योगगुरु बाबा रामदेव से तल्खी के साथ सवाल करना उनको भारी पड़ गया। उस शो में पुण्यप्रसून ने रामदेव से एक पत्रकार की जगह किसी जांच अधिकारी के समान सवाल किए थे और इसके फलस्वरूप आजतक ने उन्हें अपने चैनल से बाहर कर दिया। इससे पहले 2014 के चुनाव के वक्त ‘आम आदमी पार्टी’ के इंटरव्यू को ‘फिक्स’ करने के आरोप भी वाजपेयी पर लग चुके हैं। इसके बाद वाजपेयी ने एबीपी न्यूज़ जॉइन किया और वहां आने वाले शो ‘मास्टरस्ट्रोक’ में सरकार पर लगातार कई हमले बोले। यहां भी कई बार झूठी और निराधार खबरें चलाने के आरोप इन पर लग चुके हैं।

चर्चा यह भी है कि वाजपेयी के इस शो ‘मास्टरस्ट्रोक’ के प्रसारित होने के समय पर जानबूझकर रुकावटें डाली जाती थीं, जिससे कभी इस शो का ऑडियो बंद हो जाता था तो कभी तस्वीरें दिखना बन्द हो जाती थीं। अभिसार की बात करें तो ये वही पत्रकार हैं, जिनका ज़िक्र मैंने कुछ दिन पहले किया था, जो धान का मतलब लोगों को गेहूं समझा रहे थे। प्रसिद्ध लोक कलाकार मालिनी अवस्थी से अभिसार की सोशल मीडिया पर कई बार गर्मागर्म बहस हो चुकी है, जिसके फलस्वरूप मालिनी ने इनके खिलाफ शिकायत भी दर्ज करवा रखी थी। बिना साक्ष्य के खबर चलाने के इन पर भी कई केस चल रहे हैं।

मिलिंद खांडेकर चूंकि पर्दे पर स्वयं नहीं आते थे इसलिए दर्शकों को इनके बारे में बहुत कम जानकारी है| इसके सिवाय कि वे 14 सालों से एबीपी न्यूज़ में हैं। इन पत्रकारों के इस्तीफे और जबरन छुट्टी पर भेजने का मुद्दा लोकसभा तक गूंज उठा। मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस फेरबदल को सरकार की मीडिया पर दबाव बनाने और उनका मुंह बंद करने का प्रयास बताया है तो सरकार की तरफ से केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धनसिंह राठौड़ ने इसे चैनल का आंतरिक मामला बताते हुए सरकार के किसी भी हस्तक्षेप से इनकार किया।

ये दो पत्रकार निशाने पर ज़रूर आ गए हैं, लेकिन इन सबके बीच सरकार के खिलाफ पत्रकारिता क्षेत्र में सबसे बुलंद आवाज़ करने वाले एनडीटीवी के रवीश कुमार का बने रहना चौंकाने वाला है। अपने शो ‘प्राइम टाइम’ में रवीश आज भी सरकार के खिलाफ सीधा हमले बोलने में कभी नहीं चूकते, लेकिन कहने वाले कह रहे हैं कि पिछले दरवाजों से रवीश की आवाज़ भी ‘मंद’ कर दी गई है।

एक निष्पक्ष पत्रकार का सरकार पर सवाल उठाना बिल्कुल जायज़ है, लेकिन सरकार के अच्छे कामों की तारीफ करने में भी पीछे नहीं रहना चाहिए। आज की तारीख में कुछ पत्रकार सरकार के प्रवक्ता की तरह बर्ताव कर रहे हैं और कुछ पत्रकार (जिनकी संख्या बेहद कम हो चली है) विपक्ष की तरह सरकार के हर कदम में मीनमेख निकालने में लगे रहते हैं। पत्रकारों की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब किसी मुद्दे पर किस मीडिया हाउस या पत्रकार का क्या स्टैंड होगा, यह जनता पहले से तय न कर सके। सच्चे अर्थों में निष्पक्ष पत्रकारिता यही होगी, जो डंके की चोट पर गलत बात को गलत कहने और सच बातों का समर्थन करने की हिम्मत कर सके। बाकी मीडिया को भला-बुरा कहने वालों को नजरअंदाज़ करने के अलावा कोई उपाय नहीं है।

-सचिन पौराणिक

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