Talented View : बयान की जंग

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दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के खिलाफ महीने भर से ज्यादा से प्रदर्शन चल रहा है। प्रदर्शनकारियों ने आंदोलन की आड़ में मुख्य सड़क पर भी कब्ज़ा जमा लिया है। स्थानीय नागरिक तमाम तरह की दिक्कतों से जूझ रहे है लेकिन इस अराजक आंदोलन की गुंडागर्दी पर चर्चा की जगह अचानक सुपरस्टार रजनीकांत (Cartoon On Rajnikant Tweet Controversy) सुर्खियों में आ गए है। पेरियार को लेकर उनके एक कथित बयान पर हंगामा मचा हुआ है और सोशल मीडिया पर रजनीकांत के समर्थन में #IstandWithRajnikant ट्रेंड होने लगा है।

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(Cartoon On Rajnikant Tweet Controversy) पेरियार के नाम से विख्यात ई. वी. रामास्वामी तमिलनाडु के एक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनकारी थे। समाज पर उनका असर इतना गहरा है कि कम्युनिस्ट और दलित आंदोलन की विचारधारा वाले आज भी उनका सम्मान करते हैं और उनकी कही बातों का हवाला देते है। रजनीकांत ने सिर्फ इतना कहा कि पेरियार कभी हिन्दू देवी-देवताओं का सम्मान नही करते थे। इतना कहते ही सारा देश ऐसे इस मुद्दे पर टूट पड़ा मानो और कोई मुद्दा बचा ही न हो।

(Cartoon On Rajnikant Tweet Controversy) दरअसल तमिल मैगजीन ‘तुगलक’ (Tughlaq) से एक साक्षात्‍कार में रजनीकांत ने पेरियार द्वारा वर्ष 1971 में निकाली गई एक रैली का उल्‍लेख किया। उनके अनुसार सन1971 में सलेम में पेरियार ने एक रैली निकाली थी। इसमें भगवान राम और सीता की वस्त्रहीन तस्वीरें मौजूद थीं और उन पर जूते चप्पलों की माला भी पहनाई गयी थी। रजनीकांत के इसी बयान पर एक तबका आपत्‍ति जता रहा है और उनके खिलाफ मामला दर्ज करने की बात कर रहा है। लेकिन रजनीकांत ने भी साफ कर दिया है कि न वो अपने शब्द वापस लेंगें और न ही माफी मांगेंगे।

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रजनीकांत (Cartoon On Rajnikant Tweet Controversy) का कहना है कि उन्होंने कुछ भी कल्पनाशीलता या अज्ञानवश नही कहा है। उन्होंने वही कहा जो उस समय की पत्रिकाओं में छपा था। और पेरियार हिन्दू देवी-देवताओं का सम्मान नही करते थे ये भी सब जानतें है। पेरियार तो बहुत पुराने है। आज भी कई असामाजिक तत्व दलित आंदोलन के नाम पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्रों को जुते से मारते है, आग लगातें है और अपशब्द कहतें है। देश का बहुसंख्यक हिन्दू ये सब अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बर्दाश्त कर रहा है।

लेकिन रजनीकांत (Cartoon On Rajnikant Tweet Controversy) जैसा अभिनेता जब तथ्यात्मक बात भी कहता है तो उनकी आवाज़ को दबाने की साजिश होने लगती है।ये कौन लौग है जो सच्चाई का आईना सामने रखते ही गुंडागर्दी पर उतर आतें है? रजनीकांत ने कुछ गलत कहा तो उसे तथ्य सामने रखकर गलत साबित करने की बजाय सीधे सीधे उनका विरोध करना, उनकी आवाज़ दबाना क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला नही है? जबकि विरोध तो पेरियार और उनकी उस विचारधारा का होना चाहिए जो दूसरे के धर्म के आराध्य का अपमान करके समाज़ में जहर घोल रहे है।

रामास्वामी (Ramaswamy) अगर खुद को ‘पेरियार’ के नाम से पहचाना जाना पसन्द करतें है तो इससे ही पता चलता है कि उन्हें राम के नाम से कितनी चिढ़ है। लेकिन उनके माता-पिता सम्भवतः ऐसे नही नही होंगे, अन्यथा वे अपने बेटे का नाम रामास्वामी कभी नही रखते। खेर, शाहीन बाग की मुख्य सड़क आज भी बंद है। प्रदर्शनकारियों ने महीने भर बाद आज अहसान करते हुए एम्बुलेंस और स्कूल बस को रास्ता देने की बात कही है। देश की राजधानी में सरेआम चल रही इस ‘गुंडई’ पर तथाकथित दलित चिंतकों की आवाज़ मौन है लेकिन रजनीकांत का विरोध जोरशोर से हो रहा है। अभिव्यक्ति की आज़ादी का ये भी एक अज़ब ही दोगलापन है।

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-सचिन पौराणिक

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