Talented View : मामला बड़ा उलझा है

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(Cartoon On Collector Slaped Leader) बीते दिनों की दो घटनाओं पर नज़र डालिये।पहली घटना ब्यावरा की है जहां महिला कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर ने सीएए के समर्थन में निकली रैली में खुद ही लोगों पर थप्पड़ चलाये। दूसरी घटना जयपुर की है जहां महिला एसडीएम निरीक्षण के दौरान डॉक्टर की कुर्सी पर बैठने के लिए अड़ गयी। महिला अधिकारियों के इस रवैये पर देश में एक चर्चा चल पड़ी है कि क्या उनका तरीका सही है? सोशल मीडिया पर ब्यावरा की कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर का समर्थन किया जा रहा है लेकिन मामला इतना सीधा नही है।

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(Cartoon On Collector Slaped Leader) पहली बात ये की सीएए के समर्थन में देशभर में, विशेषकर मध्यप्रदेश में, हर शहर में विशाल रैलियां निकाली जा रही है और हर रैली बिना किसी अनुमति के ही निकाली गई है। लेकिन कहीं प्रशासनिक अधिकारियों ने ऐसी बदतमीजी नही की। धारा 144 लगी होने के बाद भी जनसैलाब सड़कों पर उतर आए तो प्रशासन कर भी क्या सकता है? ऐसे में यही हो सकता है कि प्रशासन धैर्य के साथ काम ले और शांति बनाए रखे। बाद में जो कार्यवाही करना है वो करे।

लेकिन ब्यावरा कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर ने जो किया उसमे तारीफ के लायक कुछ नज़र नही आ रहा है। कलेक्टर का काम होता है भीड़ को कंट्रोल करना लेकिन ब्यावरा कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर तो खुद को ही कंट्रोल नही कर पा रही है। कलेक्टर खुद सड़को पर गुंडागर्दी कर रही है तो जनता को क्या संदेश जाएगा? कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर खुद सडको पर ऐसे भीड़ से जूझेगी तो पुलिस का क्या काम है? पुलिस की ट्रेनिंग भला किस काम की अगर कलेक्टर को ही भीड़ को तमाचे जड़ने है?

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(Cartoon On Collector Slaped Leader) महिला अधिकारियों की ऐसी हरकत सड़कछाप से ज्यादा नहीं है। लौग इन्हें झांसी की रानी कह रहे है लेकिन हकीकत में ये प्रशासन में रहने लायक भी नही है। खुद के व्यवहार को कंट्रोल न कर पाने वाली अधिकारी भीड़ को भला कैसे कंट्रोल करेगी? इस तरह की नादानी भीड़ को सिर्फ उत्तेजित ही करती है। इस तरह का व्यवहार न सिर्फ आपत्तिजनक है बल्कि इन पर कार्यवाही की भी जरूरत है। ये व्यवहार यही दिखाता है कि महिला अधिकारियों पर कलेक्टरी का नशा कुछ ज्यादा ही चढ़ गया है। इसी नशे में ये गुंडागर्दी पर उतर आई है।

(Cartoon On Collector Slaped Leader) अब तस्वीर का दूसरा पहलू भी देख लेतें है। शांतिपूर्ण रैली को रोकने के लिए अधिकारियों ने गुंडागर्दी की। लेकिन अगर जुम्मे की नमाज़ के बाद निकले जुलूस पर भी मेडम ऐसी ही गुंडागर्दी दिखाती तो उन्हें तुरन्त पता चल जाता कि भीड़ क्या होती है और भीड़ की हिंसा क्या होती है? शांति के आग्रह के साथ प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को ये मोहतरमा तमाचे जड़ रही है लेकिन जब नंगी तलवारे, हथगोले और पत्थरों वाली भीड़ सामने आएगी तब इनको पता चलेगा कि भीड़ पर बलप्रयोग करने का क्या हश्र हो सकता है? तब इनके अंदर की झांसी की रानी न जाने कहाँ गायब हो जायेगी।

(Cartoon On Collector Slaped Leader) अगर इन्हें बहादुरी दिखाने का ज्यादा शौक है तो इनकी पोस्टिंग नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कर दी जानी चाहिए जिससे मेडम वहां भी अपनी वीरता दिखला सके। निहत्थे प्रदर्शनकारियों को तमाचे मारना, कॉलर खींचना कलेक्टर का काम नही होता। ऐसा करते ये अधिकारी कलेक्टर नही बल्कि सड़कछाप मवाली दिखाई दे रही थी। इन्हें समझना चाहिए कि भीड़ को नियंत्रित करने से जरूरी है खुद के व्यवहार को नियंत्रण में रखना। ऐसी अपरिपक्व महिलाएं प्रशासनिक अधिकारी कैसे बन गयी ये जांच का विषय होना चाहिये। ऐसी नादान महिलाएं प्रशासनिक अधिकारी बनकर आएंगी तो प्रशासन और जनता के बीच तनाव हमेशा बढ़ता ही रहेगा।

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-सचिन पौराणिक

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