सत्ताधीशों का अहंकार जनता को पसंद नहीं

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2014 के बाद से लगातार चल रहे भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ को हिंदी भाषी प्रदेशों की जनता ने जोरदार झटका दिया है। एक के बाद एक लगातार चुनाव जीतने से ऐसा भ्रम हो गया था कि भाजपा को हराना असंभव हो चुका है, लेकिन जैसे परिणाम आये हैं, उससे यह भ्रम भी टूट चुका है। चुनाव विश्लेषक इस पराजय की चाहे जो वजह बताएं, लेकिन असली वजह सिर्फ सत्ता का अहंकार था। भाजपा नेताओं का यह अति आत्मविश्वास कि वे किसी को भी टिकट दे, जनता उसे चुन ही लेगी के रवैये से जनता उनसे दूर होती चली गई। अंधभक्तों के कुतर्क और हवाई दावों ने भी जनता को खूब चिढ़ाया। जनता की समस्या सुनने और हल करने के बजाय उन्हें देशभक्ति का पाठ पढ़ाना भाजपा और संघ को भारी पड़ गया। जिन बुनियादी मुद्दों को लेकर सत्ता में आए उन्हीं को भुला देना भी जनता को रास नहीं आया।

शिवराजसिंह और रमनसिंह के विकास में कोई कमी नहीं थी। दोनों को लेकर जनता में कोई विशेष गुस्सा भी नहीं था, लेकिन संघ-भाजपा के छुटभैये नेताओं और  कार्यकर्ताओं के रवैये ने जनता के गुस्से को खूब उकसाया। इसके अलावा एक बड़ी बात जो भाजपा को समझ लेना चाहिए कि पंचायत से लेकर पार्षद और  विधायक के हर चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को देखकर वोट नहीं डाला जा सकता। जनता के असल मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय मोदी-मोदी करना भी भाजपा को भारी पड़ा है।

प्रधानमंत्री ने सर्वश्रेष्ठ काम किया है, इसमे कोई संशय नहीं, लेकिन ये चुनाव राज्य के थे। अमित शाह से लेकर हर भाजपा नेता जनता को राज्य सरकारों के काम गिनाने के बजाय सर्जिकल स्ट्राइक और जनसंख्या रजिस्टर के नाम पर वोट मांगते रहे, लेकिन जनता इन कामों पर 2019 में मोहर लगाएगी, यह चुनाव राज्य सरकार के रिपोर्ट कार्ड पर ही लड़े जाने थे और जनता यह समझ रही थी। इनके बाद रही सही कसर शिवराज मामा के ‘माई के लाल’ वाले बयान ने पूरी कर दी, जिससे प्रदेश का सवर्ण भड़क गया। अपने मतदाताओं को इस तरह सीधे चुनौती देना शिवराज की बड़ी भूल थी, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा है। सिर्फ इस एक बयान ने भाजपा को कम से कम 15 सीटों का नुकसान पहुंचाया है, ऐसा वरिष्ठ भाजपाई कह रहे हैं। राजनीति में ऐसा होना जायज़ है क्योंकि मोदीजी ‘मौत के सौदागर’ पर गुजरात जीत सकते हैं तो मामाजी भी ‘माई के लाल’ पर मध्यप्रदेश हार ही सकते हैं। भाजपा की आईटी सेल भी यह समझ ले कि पांच राज्यों में भाजपा की हार से जिस प्रकार उनके समर्थक सोशल मीडिया पर बौखलाए हुए हैं और जैसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भी इस हार का एक बहुत बड़ा कारण है। हारे हुए प्रदेश की जनता को मुफ्तखोर, दोगले हिन्दू और जाने क्या-क्या उलाहने दिए जा रहे हैं।

भक्तों की माने तो जिसने भाजपा को वोट नहीं दिया, वह सच्चा देशभक्त हो ही नहीं सकता। आत्ममंथन और गलतियों से सीखने के बजाय 15 साल से भाजपा को जीता रही जनता को दोष देने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। इससे जनता का गुस्सा और भड़केगा ही| नतीजे सही ही आए हैं। कांग्रेस के लिए ये नतीज़े सर्दियों की धूप की तरह है। मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस में एक नया जोश इन तीन राज्यों के नतीजे से भर चुका है, लेकिन उन्हें ज्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है। ये परिणाम कांग्रेस पर भरोसे से ज्यादा भाजपा को सबक सिखलाने के लिए दिए गए प्रतीत होते हैं। बढ़ा हुआ मतदान का प्रतिशत यही दर्शाता है कि भाजपा के खिलाफ जनता ने खुलकर मतदान किया है। कांग्रेस ने चुप रहकर सिर्फ एक विकल्प दिया और जनता ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। कांग्रेस के लिए अपने नेताओं में सामंजस्य बैठाना और मुख्यमंत्री चुनना भी आसान नहीं रहने वाला है। ये नतीजे कांग्रेस के लिए संजीवनी बने हैं, यह बात पक्की है। लोकतंत्र में जनता सबकुछ होती है और जनता ने यह समझा दिया है कि सत्ताधीशों का अहंकार उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। विकास करना नेताओं की जिम्मेदारी है और इसे एक अहसान की तरह पेश करना भी जनता को कतई बर्दाश्त नहीं है। यह वक्त अब पुनः अपनी जड़ों की तरफ लौटने का है, जब भाजपा नेता जनता की आवाज़ हुआ करते थे। जनता को वादाखिलाफी भी पसंद नहीं आती है इसलिए सत्ताधीश एक बार अपनी सूरत आईने में देखें और पहचानने की कोशिश करें कि उनकी विचारधारा के मूल में क्या है? जड़ों को पोषण देकर ही ऊंचाई प्राप्त की जा सकती है, उनमें मट्ठा डालकर नहीं। यही बात इन चुनाव नतीज़ों के मूल में है।

 

-सचिन पौराणिक

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