जाना था जापान पहुंच गए चीन..

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मेरे घर से दो गली छोड़कर एक दीदी रहती हैं सपना, (बदला हुआ नाम) जिनकी उम्र अब 40 के करीब होगी। लगभग 10 सालों से वे एक लड़की के साथ घूमती-फिरती हैं। वह लड़की दरअसल एक लड़के जैसी दिखती है, जिसके बाल, पहनावा और रहन-सहन लड़के जैसा ही है। प्रथमदृष्टया उसे देखकर कोई भी उसे लड़का समझने की भूल कर सकता है। सपना दीदी के घरवालों की हमेशा से इच्छा है कि वह शादी करके घर-गृहस्थी बसा ले, लेकिन दीदी को अपनी सहेली के साथ रहना ही भाता है। दोनों अक्सर साथ ही रहते हैं और घूमते-फिरते हैं| दोनों ने ही शादी नहीं की है, लेकिन समाज में उन दोनों के लिए किस्म-किस्म की बातें होती रहती हैं। वे दोनों भी यह बात जानते हैं इसलिए अपने रिश्ते को लेकर खुलकर कभी कुछ नहीं कहते।

कल धारा 377 पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सपना दीदी जैसे सैकड़ों जोड़ों को एक बहुत बड़ी खुशखबरी दी है। 4 साल पहले केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही जनता को उम्मीद जागी कि अब देश में कुछ अच्छा होगा। सरकार का नारा भी था कि अच्छे दिन आने वाले हैं। जनता को भी लगने लगा कि अब विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस वतन आएगा, महिलाओं की सुरक्षा होगी, भ्रष्टाचारी जेल जाएंगे, देश की सीमाएं सुरक्षित होंगी, पाकिस्तान हमारी तरफ आंख उठाने से पहले सोचेगा, दाऊद इब्राहिम को भारत लाया जाएगा, बेरोज़गारी दूर होगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा, राम मन्दिर बनेगा, समान नागरिक संहिता लागू होगी और धारा 370 हटेगी, लेकिन इनमें से एक भी ठोस काम सरकार ने नहीं किया।

सरकार ने अपना पूरा ध्यान आधार कार्ड से पैन कार्ड, आधार कार्ड से बैंक एकाउंट और आधार कार्ड से सिम कार्ड को जोड़ने पर लगाया। इसके अलावा बड़ी बेशर्मी के साथ एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाकर दलित वोटों को साधने के लिए देश के सवर्ण और पिछड़े तबके के साथ एक भद्दा मजाक किया। अब देश के साथ पूरी दुनिया में भारत की थू-थू हो रही है, लेकिन सरकार अपने कानों में तेल डालकर बैठी है। सरकार अपनी राह से किस तरह भटकी है, उसका ताज़ा उदाहरण है कि धारा 370 हटाने की जगह धारा 377 कोर्ट द्वारा हटाई जा चुकी है। समलैंगिक तबके को जबरदस्त राहत देते हुए कल देश की सर्वोच्च अदालत ने धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए इसे अन्याय और मनमाना बताया है।

हालांकि बच्चों और पशुओं से अप्राकृतिक यौन संबंध अब भी अपराध की श्रेणी में ही रहेंगे, लेकिन फिर भी गे, ट्रांसजेंडर, बाइसेक्सुअल और लेस्बियन समाज को इससे बहुत बड़ी राहत मिली है। दो वयस्कों के बीच सहमति से बने यौन संबधों पर अब किसी तरह की कोई रोक नहीं रहेगी। इस फ़ैसले के साथ ही देश में एक बड़ी बहस शुरू हो गई है कि समाज अब किस दिशा में जाएगा क्योंकि कोर्ट ने भले ही इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है, लेकिन अब देखना यह है कि समाज इन रिश्तों को कैसे स्वीकारेगा? दो लड़कियां या फिर दो लड़के यदि साथ रहते हैं तो इनका जीवन कैसा होगा?

क्या इससे अब देश मे ‘सरोगेसी’ की मांग बहुत ज्यादा नहीं बढ़ जाएगी? क्या बीतेगी उन मां-बाप पर, जिनका बेटा-बेटी इस तरह के संबंधों में लिप्त रहेगा? इन संबंधों का चरित्र कैसा रहेगा और समाज पर इनका दूरगामी परिणाम क्या होगा, यह गंभीर चिंतन की बात है। निजी तौर पर मेरा मानना है कि इस तरह के संबंध स्वीकार्य नहीं होने चाहिए क्योंकि ये मानसिक रुग्णता की निशानी है। लेकिन साथ ही ये भी मानना है कि अगर कोई सहमति से ऐसे संबंध बनाता है तो यह कोई गुनाह भी नहीं है।

दो वयस्कों के संबंध आपस में कैसे भी रहे, समाज को इसमें दखल देने का कोई हक़ नहीं है। हां, खुले तौर पर इस तरह के संबंधों की नुमाइश ज़रूर नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे दूसरों की भावनाएं आहत हो सकती है, लेकिन फिर भी कोर्ट के इस फैसले से सपना दीदी जैसे देश के हजारों व्यक्तियों को अपनी अलग पहचान बनाने का मौका ज़रूर मिलेगा।

यह सुप्रीम कोर्ट का एक ऐसा फैसला है, जिसके विरोध में हिन्दू-मुस्लिम धर्मगुरु दोनों ही साथ नज़र आ रहे हैं। भाजपा नेता सुब्रहमण्यम स्वामी भी इस फैसले से खुश नहीं है और उनको लगता है कि यह फैसला देश की संस्कृति को तबाह कर देगा। इधर, देश की जनता को उम्मीद थी कि इस सरकार के कार्यकाल में धारा 370 हटेगी, लेकिन हुआ उल्टा और धारा 377 हटा दी गई है। देश में धारा 377 के इस प्रावधान को हटाने से कितने लोग लाभान्वित होंगे, इसका सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है इसलिए चुनावी राजनीति में इस फैसले का क्या असर होगा, यह किसी को नहीं पता। यह बात तय है कि यदि यह आंकड़ा बढ़ता है तो राजनीतिक पार्टियां इस मामले पर भी श्रेय लेने से पीछे नहीं हटेंगी।

-सचिन पौराणिक

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