Talented View : इन्हें अपना सेनापति बदल ही देना चाहिए

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ऐसा कहते हैं कि 100 भेड़ों की सेना का सेनापति यदि एक शेर होता है तो पूरी सेना शेर की तरह लड़ती है। इसके उलट यदि 100 शेरों की फौज का सेनापति एक भेड़ हो तो शेर भी युद्ध में भेड़ की तरह ही युद्ध करते हैं। कहने का मतलब यही है कि युद्ध के समय सेनापति का महत्व सबसे ज्यादा होता है। लोंगेवाला की लड़ाई में हमने देखा ही है कि भारत की सेना के मात्र 120 फौजियों ने पाकिस्तान के 2000 फौजी, जो टैंक रेजीमेंट के साथ युद्ध करने आए थे, उन्हें हरा दिया।

मेजर कुलदीपसिंह चांदपुरी ने शेर की तरह अपने जवानों में हिम्मत और वीरता भर दी, जिससे पाक सेना बुरी तरह पराजित हुई। इसी युद्ध पर फ़िल्म ‘बॉर्डर’ बनी है। राजनीति भी युद्ध की तरह ही होती है। यहां भी यदि नेतृत्व सही मिल जाए तो पार्टी के कार्यकर्ता चुनाव में अपनी जान झोंककर प्रचार में जुट जाते हैं। इसके विपरीत यदि नेतृत्व ही कमजोर हो तो ढीले मनोबल के चलते जीती-जिताई बाज़ी भी हार सकते हैं। भारत में किसी भी पार्टी को चुनाव जिताने का श्रेय कार्यकर्ताओं को जाता है। ऐसे में नेतृत्व ऐसा होना चाहिए, जो अपने कार्यकर्ताओं में ऐसा जोश भर दे कि उनके आत्मविश्वास को देखकर मतदाता भी चकित हो जाएं।

तीन राज्यों में मिली जीत से कांग्रेस कार्यकर्ता आजकल जोश से भरे हुए हैं, लेकिन उनका शीर्ष नेतृत्व उनके इस जोश को ज्यादा दिन टिकने नहीं देता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी थोड़े दिनों के अंतराल में हर बार कुछ ऐसा कारनामा कर देते हैं, जिससे उनके राजनीतिक तौर पर परिपक्व होने के दावों की वे खुद ही हवा निकाल देते हैं। ताज़ा मामला उनका गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर से मिलने का है, जिस पर बवाल मचा हुआ है।

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गोवा के मुख्यमंत्री से अचानक मिलने पहुंचकर राहुल गांधी ने सभी को चौंका दिया। कहा गया कि यह शिष्टाचार भेंट थी। राहुल ने भी यही कहा कि यह एक सामान्य मुलाकात थी, जिसमें वे पर्रिकर का हाल-चाल जानने आए थे। बाद में राहुल ने जैसे ही मीडिया में यह कहा कि पर्रिकर ने मुलाक़ात के दौरान कहा कि रफाल सौदे में उनकी कोई भूमिका नहीं थी| इसके बाद पर्रिकर आगबबूला हो उठे। उन्होंने राहुल के नाम खुला पत्र लिखकर इस पर अपना तीखा विरोध जताया और राहुल पर निचले स्तर की राजनीति करने का आरोप लगा दिया।

गौरतलब है कि पर्रिकर इस समय जानलेवा कैंसर से जूझ रहे हैं। उनकी स्थिति बेहद नाजुक है, लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी वे निष्ठा के साथ गोवा की जनता की सेवा में लगे हुए हैं। पर्रिकर ऐसे नेता हैं, जिनकी सादगी और ईमानदारी की विरोधी भी मिसाल देते हैं, लेकिन उनके बहाने रफाल सौदे पर निशाना लगाने से राहुल की गंभीरता और राजनीतिक परिपक्वता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।

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राहुल को पर्रिकर की तबीयत पूछने के बहाने ओछी राजनीति करते देख उनके कार्यकर्ता भी हैरान हैं। पर्रिकर से सौजन्य भेंट करने से उनका जो थोड़ा-बहुत राजनीतिक कद बढ़ा था, वह ऐसी हरकतों के कारण दोबारा बौना हो गया है। जब भी लगता है कि राहुल गांधी अब परिपक्व हो गए हैं, तब कभी वे संसद में आंख मार देते हैं तो कभी कुछ उल्टे-सीधे बयान दे डालते हैं तो कभी ऐसी हरकतें कर बैठते हैं।

राहुल गांधी जैसा सेनापति होना कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए सचमुच बड़ी चुनौती है। दूसरी तरफ जब नरेंद्र मोदी जैसे विराट व्यक्तित्व के नेता हों तो उन हालातों में विशेषकर कांग्रेस को अपना सेनापति बदल ही देना चाहिये। राहुल जैसे सेनापति के सहारे कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाएंगे।

-सचिन पौराणिक

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