सोशल मीडिया के ‘भक्त’ कृपया ध्यान दें…!

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आजकल सोशल मीडिया में कुछ भक्त किस्म के लोग ज्यादा सक्रिय हो चले हैं। इनकी यह विशेषता होती है कि जो इनके सुर में सुर न मिलाए, उसे ये तुरंत राष्ट्रद्रोही घोषित कर देते हैं। खैर, अभी का विषय यह है कि ये भक्त अपने फॉलोअर्स को प्रभावित करने के लिए ऐसी-ऐसी परिकथाएं गढ़ते हैं, जिन पर अव्वल तो विश्वास नहीं होता। दूसरा हो भी गया तो इससे इनकी निरी मूर्खता के अलावा कुछ सिद्ध भी नहीं होता। ऐसे ही एक भक्त शिरोमणि (जो फेसबुक पर ‘चंदाचोर’ के नाम से भी कुख्यात है) का कहना है कि इन्होंने अपने ईष्ट मित्रों से लड़ाई कर ली, लेकिन पार्टी का साथ नहीं छोड़ा।

हुआ यूं कि इनके मित्र ने एक पार्टी विशेष से विधायकी का चुनाव लड़ा और स्वाभाविक तौर पर ये उम्मीद रखी कि ये महोदय भी उनका साथ देंगे, लेकिन जैसा कि होता आया है भक्त अपने भगवान के अलावा किसी को कुछ समझते नहीं और न ही कभी साथ देते हैं। इन महाशय ने भी अपने मित्र के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। मित्र इस व्यवहार से आहत हुए और दोस्ती में दरार आ गई, लेकिन दोस्त को दगा देने के बाद भी ये महाशय अपने आप को त्याग और देशभक्ति की मूर्ति बताने में पीछे नहीं हट रहे।

कुछ तस्वीरें अच्छी लगती है, जैसे कल तीन राज्यों में नए मुख्यमंत्रियों के शपथग्रहण समारोह के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री के साथ नए मुख्यमंत्री। कमलनाथ और शिवराजसिंह हाथ में हाथ डाले कितने बेहतरीन दिखाई दे रहे थे। इसके अलावा वसुंधराराजे भी अशोक गहलोत के शपथग्रहण में सबसे पहले पहुंचने वालों में से थी। गहलोत ने भी आत्मीयता के साथ वसुंधरा का स्वागत किया। कुछ दिन पहले इन्हीं नेताओं के बीच जुबानी जंग इतनी तेज़ हो चली थी कि तब ऐसी तस्वीरों की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

कमलनाथ ने भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरन्त बाद अपने वादे को निभाया और किसानों के 2 लाख तक के कर्ज़ को माफ कर दिया। मध्यप्रदेश में 15 साल और केंद्र में साढ़े चार साल विपक्ष में रहकर शायद कांग्रेस समझ चुकी है कि अपने वादे पूरे करना और जनता के लिए काम करना ही सत्ता में रहने का एकमात्र उपाय है। केंद्र का कांग्रेस नेतृत्व भी शायद यह समझ चुका है कि जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है और ये उम्मीदें यदि वे पूरी नहीं कर पाएंगे तो जनता उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाने में देर नहीं करेगी।

“पॉलिटिक्स ऑफ परफॉर्मेंस” सही मायनों में यही है कि जनता के कामों को वरीयता से पूर्ण किया जाए। कल सामने आई तस्वीरें स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भी ज़रूरी है और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए भी। इन तस्वीरों से यह बात भी सिद्ध हो जाती है कि नेताओं और पार्टियों का पिछलग्गू बनकर अपने ही दोस्तों और रिश्तेदारों से संबंध खराब करने का कोई तुक नहीं बनता। सरकारें आती हैं, जाती हैं, लेकिन आपके साथ ज़रूरत के वक्त सिर्फ आपके दोस्त और रिश्तेदार ही खड़े मिलेंगे। सरकार और नेता को कोई फर्क नहीं पड़ेगा इस बात से कि पार्टी के समर्थन के लिए आपने निजी रिश्ते खराब कर लिए। कमलनाथ और शिवराज हो, कैलाश विजयवर्गीय और दिग्विजयसिंह हो, चाहे वसुंधरा और अशोक गहलोत हो, ये नेता आपस में अपने रिश्ते कभी खराब नहीं होने देते। विचारधारा में लाख विरोध होने के बाद भी नेताओं के निजी कार्यक्रमो में विरोधी दल के नेता भी नज़र आते हैं।

सार्वजनिक मंचों पर भी ये नेता आपस में बड़े प्रेम से मिलते हैं क्योंकि इन्हें पता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। नेता इन मामलों में समझदार हैं, लेकिन जनता बिल्कुल मूर्ख है। सोशल मीडिया के भक्त जो पार्टी के लिए अपने मित्रों से लड़ लेते है और इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, वे तो सबसे बड़े मूर्ख है। बात यहां विचारधारा की है ही नहीं बल्कि समझदारी की है। भावनाओं में बहकर अपने दोस्तों और  रिश्तेदारों से गर्मागर्म बहस करने से पहले हाथ में हाथ डाले इन नेताओं की तस्वीरें एक बार सभी को याद कर लेना चाहिए।

-सचिन पौराणिक

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