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Talented View : जनता पर बोझ लादना बंद करो, हैप्पीनेस इंडेक्स बढ़ेगा

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शशि थरूर ने एक बार कहा था कि इस देश में सबसे बड़ा बेरोज़गार कोई है तो वह है राज्यमंत्री। यह बात थरूर ने तब कही थी, जब वे यूपीए में राज्यमंत्री थे। उनका इशारा साफ था कि मंत्री पद पर होते हुए भी वे बिल्कुल खाली हैं। उनकी बात सच है क्योंकि तकनीकी रूप से देखा जाए तो राज्यमंत्री के पास ढंग का एक काम नहीं होता है। ऐसे हालातों में कई मंत्री ऐसे होते हैं, जिनके पास मंत्रालय तो होता है, लेकिन करने को कुछ काम नहीं होता है। प्रदेश की सरकारें भी आमतौर पर अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए मंत्रालय तो बना लेती है, लेकिन उन्हें काम सौंपना भूल जाती है। जैसे गौसंवर्धन मंत्रालय राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने बनाया था, लेकिन इस मंत्रालय में पास फंड ही नहीं था, जिससे वे कुछ काम कर सके।

मोदीजी को इस तरफ गौर ज़रूर करना चाहिए

ऐसे ही मध्यप्रदेश सरकार का भी एक मंत्रालय है- अध्यात्म मंत्रालय। कहा गया है कि यह मंत्रालय राम वन गमन पथ क्षेत्र में विकास और पवित्र नदियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम करेगा। यह मंत्रालय फिलहाल इसलिए सुर्खियों में आया है क्योंकि कमलनाथ सरकार एक सर्वे की शुरुआत करने जा रही है, जिससे यह जानने की कोशिश की जाएगी कि आप खुश हैं या नही? अध्यात्म मंत्रालय के तहत ‘आनंद संस्थान’ यह सर्वे करेगा। आईआईटी खड़गपुर द्वारा तैयार किए गए 30 प्रश्नों की सूची के आधार पर यह सर्वे किया जाएगा। इन प्रश्नों के आधार पर एक “हैप्पीनेस इंडेक्स” तैयार किया जाएगा और इसमें लगभग हर तरह के प्रश्न शामिल किए जाएंगे। सितम्बर से शुरू होकर यह सर्वे मार्च 20 तक खत्म करने की प्लानिंग है।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

अब सवाल है कि इस तरह का हैप्पीनेस इंडेक्स तैयार करना क्या समय और संसाधनों की बर्बादी नहीं है? जिस आनंद संस्थान को यह सर्वे करने की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें इससे पहले इस तरह के कार्य करने का क्या अनुभव है? इस संस्थान की वेबसाइट पर जाएं तो लिखा नज़र आता है कि “वृक्ष फल और छाया, फूल खुशबू, सूर्य रोशनी और समुद्र वर्षा देता है। यह उनका स्वभाव है, आपका स्वभाव क्या है?” इसका जवाब है हमारा स्वभाव जो भी है, लेकिन उसे जानने के लिए हमारे ही करोड़ों फूंक देना हमें बिल्कुल गवारा नहीं है। बचपन से तो सब यही सुनते आए हैं कि खुशियों को नापा नहीं जा सकता, लेकिन मध्यप्रदेश सरकार इसे नापने पर आमादा है।

तंगहाली के दौर से गुज़र रहे राज्य की माली हालत सुधारने के बजाय सरकार फ़िज़ूल की नौटंकी करने में लगी है। किसानों की कर्ज माफी के बाद प्रदेश चलाने के लिए भी सरकार के पास पैसे नहीं है। ऐसे में इस कवायद में जितना खर्च होगा, वह कहां से आएगा? जनता यदि खुश भी है तो यह अतिरिक्त बोझ उन पर पड़ेगा, जिससे वह फिर दुखी नहीं हो जाएगी?  सवाल यह भी है कि एक बार कुछ प्रश्नों के जवाब देकर क्या किसी की खुशियां मापी जा सकती है ? कमलनाथ को अपना ध्यान अधिकारियों के तबादलों से हटाकर जनता के लिए ठोस करने पर लगाना चाहिए।

यूं इस तरह जनता की गाड़ी कमाई बेवजह के सर्वे में लुटाने से प्रदेश का भला नहीं होगा। जनता तब खुश होगी, जब उसे महसूस होगा कि सरकार उनके हितों को सुरक्षित करते हुए काम कर रही है, लेकिन अपने पैसे को इन बेवजह के सर्वे में लुटता देख कोई खुश नहीं हो सकता। सरकार का काम जनता की समस्याओं को हल करना होता है न कि अपनी समस्याओं को जनता के ऊपर मढ़ना। अपने मंत्रालय की बेरोज़गारी दूर करने के लिए जनता पर बोझ लादने से जनता के हैप्पीनेस इंडेक्स का स्तर और गिरेगा ही।

Talented View : देश की न्याय व्यवस्था का यूं मज़ाक न बने

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