अपराधियों का महिमामंडन बंद करो

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कुछ दिनों पहले लालूप्रसाद यादव की एक तस्वीर देखी थी, जब वे इलाज कराने जेल से अस्पताल लाए गए थे। अस्पताल की नर्सों ने उनके साथ एक तस्वीर खिंचवाई थी, जिसमें वे सभी बड़ी खुश नजर आ रही थीं मानो किसी सेलेब्रिटी के साथ तस्वीर खिंचा रही हों। यह तस्वीर अपने आप में बहुत कुछ बयां कर रही थीं। भारतीय समाज की मनोदशा इस एक चित्र से समझी जा सकती है।

अपराधियों को हम अपना हीरो बनाकर रखते हैं। फिल्मों में अपराधियों का महिमामंडन किया जाता है। दाऊद जैसे दो कौड़ी के गुंडे को हमने वर्षों तक ‘भाई’ बोलकर इज्जत दी। राजस्थान में आनंद पाल नाम के गुंडे को मुठभेड़ में मारने के बाद उसके समर्थन में भी सोशल मीडिया पर कई लेख लिखे गए और उसे एक जाति विशेष के योद्धा के रूप में प्रसिद्धि देने की कोशिश की गई। ऐसे गुनहगारों की लिस्ट लंबी है, जिन्हें समाज ने इतनी इज्जत बख्शी, जितनी किसी खिलाड़ी और वैज्ञानिक को भी नहीं मिली होगी।

खैर, आज के मुद्दे पर आते हैं।  कल का पूरा दिन भारतीय मीडिया ने सलमान खान के नाम कर दिया और आज भी ऐसी ही उम्मीद है। खबरों के अकाल के बीच 24 घंटे के समाचार चैनल चलाने वालों की भी अपनी मजबूरियां हैं इसलिए ऐसी कवरेज स्वाभाविक है, लेकिन कल बात कुछ अलग थी। कल खबरों का अकाल नहीं था बल्कि सकारात्मक खबरों का जखीरा था। जब हमसे हजारों किलोमीटर दूर हमारे खिलाड़ी कॉमनवेल्थ खेलों में भारत का नाम रोशन कर रहे थे, तब भारत का मीडिया सलमान के नाम की माला जपने में व्यस्त था। कल दो खिलाड़ियों ने कॉमनवेल्थ खेलों में सोना और चांदी जीतकर भारत का नाम रोशन किया, लेकिन जिस निर्लज्जता के साथ सलमान खान की खबरों के बीच देश के इन असली हीरोज़ की खबर दबा दी गई, यह देखकर सिर शर्म से झुक गया।

मणिपुर की रहने वाली मीराबाई चानू ने महिला भारोत्तोलन में भारत को सोना, जबकि गुरुराज ने भी पुरुष वर्ग में चांदी दिलवाने में सफलता प्राप्त की। वर्षों की कठिन मेहनत और संयमित जीवनचर्या से दोनों ने यह मुकाम हासिल किया है। मीराबाई चानू की अपने खेल के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाज इसी से लगा लीजिये कि अपनी बहन की शादी में भी वे शामिल नहीं हुई। दोनों ही खिलाड़ियों ने कल यह ऐतिहासिक कारनामा तब किया, जब भारत की मीडिया को फुरसत नहीं थी जोधपुर की कोर्ट से बाहर झांकने की।

मानसिक दिवालियेपन का यह अनूठा उदाहरण है, जब सलमान के साथ सालों पहले जेल में रहने वाले एक कैदी और सलमान के मुम्बई स्थित घर के बाहर खड़ी फ़ुरसतियों की भीड़ की बेतुकी बातों का भी सीधा प्रसारण किया जा रहा था और इनके बीच देश का नाम रोशन करने वाले इन दो खिलाड़ियों का जिक्र तक पर्दे से गायब था। इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के दौर में अखबारों ने जरूर खिलाड़ियों के साथ न्याय किया और पहले पन्ने पर इन्हें जगह दी। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज आपको यह भी बता देगा कि जेल में सलमान कितने घंटे सोए और खाने में क्या लिया, लेकिन इन खिलाड़ियों ने किन विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष किया, यह जानकारी आपको बहुत मुश्किल से मिलेगी।

मीडिया विशेषकर हिंदी समाचार चैनलों के स्तर में आई इस गिरावट पर सोचने की जरूरत है। आज हम खिलाड़ियों को छोड़कर अपराधियों को महिमामंडित करेंगे तो कल हमारे बच्चे भी खेलों में पदक के लिए मेहनत करने की जगह अपराध का रास्ता ही चुनेंगे। बात बच्चों के भविष्य की है और इसमें लापरवाही बिल्कुल भी अच्छी बात नहीं।

-सचिन पौराणिक

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