योगियों को विशेष नमन…

0

अंग्रेजों के शासनकाल में (वर्ष 1939)  असम-बर्मा की सीमा पर हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में भारतीय कमान के भूतपूर्व सेनापति एलपी फैरेल और ब्रिटिश सेना के एक कर्नल तैनात थे। वे अपनी दूरबीन से देखते हैं कि एक नंगा वृद्ध व्यक्ति आंखें बंद किए बैठा है। उन्हें उस पर संदेह हो जाता है कि संभवत: यह कोर्इ जासूस या षड्यंत्रकारी हो इसलिए वे अपनी दूरबीन उस पर फोकस कर लेते हैं। थोड़ी देर में वे देखते हैं कि वह वृद्ध उठता है और नदी किनारे जा पहुंचता है| नदी में कोर्इ लाश बहकर आ रही होती है| वह वृद्ध उस लाश को रोकता है और उसको कठिनार्इ से खींचकर बाहर निकालता है और उस लाश के समीप बैठ जाता है। इसके बाद वह अपनी नाक को पकड़कर कुछ करता है। कुछ समय पश्चात् वह वृद्ध जमीन पर गिर जाता है, परंतु वह लाश जीवित हो उठती है।

यह दृश्य देखकर कर्नल विस्मय से भौंचक्के रह जाते हैं। वे दौड़कर उस दृश्य के समीप पहुंचते हैं। वह व्यक्ति स्थिति भांपकर मुस्कराने लगता है। कर्नल उससे कहते हैं- पहली बार उन्हें अपने आप पर विश्वास नहीं हो पा रहा है, क्या यह सच्चार्इ है या उनका कोर्इ भ्रम है? वह व्यक्ति कर्नल को समझाता है कि वह योग साधना में लीन था, लेकिन उसकी साधना की पूर्णता में अभी कुछ और समय लगना था, परंतु शरीर साथ नहीं दे रहा था। यदि नया शरीर धारण करता तो बहुत समय लग जाता तथा संसार के सुखों में भटकने का भी भय रहता, अत: उसने जब देखा कि किसी युवा पर्वतारोही की लाश बहती आ रही है तो उसने तुरंत उस लाश का सदुपयोग करने की सोची। उन्होंने वह वृद्ध शरीर छोड़ दिया और पर्वतारोही का युवा शरीर धारण कर लिया, जिससे वह इस शरीर से आगे योग साधना कर सके। कर्नल ने योगी से यह विद्या सिखाने की विनती की, लेकिन उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि इसके लिए वर्षों की साधना की जरूरत पड़ती है। हालांकि भारत के योगियों के लिए यह बहुत साधारण बात है।

कर्नल इसके बाद जब इंग्लैंड लौटे, तब उन्होंने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस घटना की जानकारी सभी को दी। उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार पॉल ब्रन्टन भी मौजूद थे, जिन्हें भारतीय संस्कृति और योग में विशेष रुचि थी। उन्होंने उस विवरण को सुनने के बाद भारत की यात्रा शुरू की। भारत की पवित्र नदियों के किनारे घूमते हुए उन्हें अनेक सिद्ध योगी मिले, जिनका संपूर्ण विवरण उनके द्वारा लिखी एक किताब ‘गुप्त भारत की खोज’ में उल्लेखित है। यह किताब अमेज़न पर उपलब्ध है।

परमहंस योगानंद की किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’  में भी योगानंद ने भारत भूमि के ऐसे अनेकों सिद्ध योगियों से अपनी मुलाकात का जिक्र किया है, जिनमें जीवन-मृत्यु के चक्र से परे भारत के महान योगी महावतार बाबाजी का भी जिक्र है। इसके अलावा हिमालय के दुर्गम शिखरों और कंदराओं में आज भी ऐसे अनेक योगी अपनी साधना में लीन हैं, जो कालचक्र के बंधन से पूर्ण मुक्त हो चुके हैं। महावतार बाबाजी के बारे में योगानंद का कहना था कि बद्रीनाथ के पास उत्तर की पहाड़ियों पर आज भी बाबा जीवंत उपस्थित हैं और कई सिद्ध योगियों ने उनके दर्शन किए हैं।

प्रसिद्ध रामकथा वाचक संत मुरारी बापू ने भी एक बार कहा था कि वह एक बाबा है और प्रधानमंत्री मोदी भी एक बाबा (योगी) ही हैं। मोदीजी के जीवन के कुछ वर्ष, जो उन्होंने हिमालय पर बिताए हैं, उसके बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। एक पत्रकार द्वारा इस बारे में सवाल पूछे जाने पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वह एक अलग दुनिया है। उसके बारे में अभी बात करने का सही वक्त नहीं है। उन कुछ वर्षों में उनकी किन सिद्ध योगियों, संतों से उनकी मुलाकात हुई और उसका क्या प्रयोजन था, यह रहस्य आज भी बरकरार है।

योग भारत की दुनिया को एक अनुपम और अद्वितीय सौगात है। इसी महान योग को भारत के आम जनमानस में पुनःस्थापित करने की दिशा में योग दिवस को पिछले 3 साल से आज के दिन यानी 21 जून को दुनियाभर में उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इसी क्रम में आज दुनिया का चौथा “अंतरराष्ट्रीय योग दिवस” है। भारत की पावन तपोभूमि में अवतरित होने वाले और समयातीत सभी योगियों को आज के दिन विशेष नमन।

-सचिन पौराणिक

Share.